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EXCLUSIVE: पंखे वाले विमानों से सुपरसोनिक जेट तक का IAF का सफर रहा कितना चुनौतीपूर्ण, युद्धों में कैसे निभाया निर्णायक रोल? स्वतंत्रता दिवस पर वायुसेना ने पूर्व अधिकारी ने बताई एक-एक बात

by Dainik Mirror
August 15, 2026
in Blog, Lifestyle
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EXCLUSIVE: पंखे वाले विमानों से सुपरसोनिक जेट तक का IAF का सफर रहा कितना चुनौतीपूर्ण, युद्धों में कैसे निभाया निर्णायक रोल? स्वतंत्रता दिवस पर वायुसेना ने पूर्व अधिकारी ने बताई एक-एक बात
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‘क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो… उसका क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।‘

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां उस शक्ति का दर्शन हैं जो शांति के साथ अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा करने की क्षमता भी रखती है। स्वतंत्रता की 79 साल की यात्रा में Indian Air Force ने इसी शक्ति की कहानी लिखी है। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब हमारे पास ब्रिटिश विरासत से निकली सीमित ताकत वाली Royal Indian Air Force थी। बंटवारे में एयरफोर्स का लगभग एक-तिहाई स्क्वाड्रन और संपत्तियां पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। तब संसाधन सीमित थे और चुनौतियां असीमित।

इसके बाद प्रोपेलर विमानों से सुपरसोनिक जेट इंजन वाले फाइटर्स तक का सफर शुरू हुआ। 1965 में पाकिस्तानी पैटन टैंक तबाह करने हों या 1971 में ईस्ट पाकिस्तान के आसमान में Air Superiority, Indian Air Force ने हर जंग में अपनी क्षमता का लोहा मनवाया। और फिर वक्त आया 1999 के कारगिल युद्ध का, जब पाकिस्तानी दुश्मन ने हजारों फीट ऊंची चोटियों पर घुसपैठ कर दी थी। तब वहां Indian Air Force ने सिर्फ बम नहीं गिराए, बल्कि जंग के बीच अपनी टेक्नोलॉजी और स्ट्रैटेजी को भी बदला। मिराज-2000 से ऐसी मार की गई कि ऑपरेशन सफेद सागर कारगिल युद्ध में बहुत हद तक निर्णायक बन गया।

तो आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर, आइए पढ़ते हैं कि 1947 की सीमित ताकत वाली Royal Indian Air Force से लेकर आज की मॉडर्न भारतीय वायुसेना तक की यह यात्रा कैसे तय हुई। इंडिया टीवी ने Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses के Senior Fellow और वायु सेना मेडल से सम्मानित IAF के रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन राजीव कुमार नारंग का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किया है, जिन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के बाद Indian Air Force के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या थीं, 1965 और 1971 के युद्ध में IAF का रोल क्या रहा और कारगिल में वायुसेना ने कैसे दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान में दुश्मन को धूल चटाई।

सवाल: 1947 में आजादी से पहले रॉयल इंडियन एयर फोर्स कितनी ताकतवर थी? भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वायुसेना की संपत्तियों और स्क्वाड्रन्स के बंटवारा कैसे हुआ, उस समय सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?

जवाब: राजीव कुमार नारंग ने कहा कि सबसे पहले मैं आपको बता दूं कि रॉयल इंडियन एयरफोर्स की स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को कराची के दृघ रोड (Drigh Road) पर हुई थी। आजादी के बाद जहां हमारी स्थापना हुई थी, वही स्थान पाकिस्तान में चला गया। इसके साथ ही लगभग एक-तिहाई वायुसेना पाकिस्तान के हिस्से में चली गई।

राजीव कुमार नारंग बोले, ‘हमारी वायुसेना तब इस तरह की नहीं बनी थी कि वह पश्चिमी क्षेत्र या हिमालयी क्षेत्रों में Real Operations कर सके। हम अभी पूरी तरह से आजाद भी नहीं हुए थे कि कबायलियों ने हम पर हमला कर दिया। भारत उस स्थिति के लिए तैयार नहीं था, उस समय दोनों तरफ के कमांडर ब्रिटिश ही थे। यह बहुत ही अजीब स्थिति थी और इसके बावजूद हम पर हमले हुए, लेकिन वो सब डिनायबिलिटी और बहुत अधिक अस्पष्टता के बीच हो रहा था।’

उन्होंने आगे कहा कि उस परिस्थिति में, भारतीय वायुसेना के पायलटों ने अपनी सूझबूझ दिखाई। सीमित एयर पावर होने के बावजूद, जब कश्मीर में हमला हुआ, तो हमारे पायलटों ने वहां जाकर लैंड किया, जहां कोई उचित व्यवस्था भी नहीं थी। वहां Air Bridge बनाना और कबायलियों को रोक पाना इतिहास का एक अभूतपूर्व हिस्सा है, जो भारत के लिए बहुत मायने रखता है।

राजीव कुमार नारंग ने बताया, ‘हमें यह भी याद रखना होगा कि भारतीय पायलटों ने World War 2 में अपना लोहा मनवाया था। लेकिन मैं एक बात और याद दिलाना चाहूंगा कि जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, तब ब्रिटेन से प्रोफेसर वेल्स भारत आए थे। वह यह देखने आए थे कि क्या भारत में टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का इकोसिस्टम है? और वह यहां नहीं था। उन्होंने जो भी सिफारिशें दीं या जो भी टेक्नोलॉजी का डेटा था, वह सिर्फ यूरोपीय देशों के अधिकारियों के साथ साझा किया जाता था, भारतीयों के साथ नहीं। उस स्थिति से शुरुआत करने के बाद भारत ने इस क्षेत्र में जो प्रगति की है, वह बहुत ही सराहनीय है।’

हमारे वैज्ञानिकों और पायलटों को जो भी मशीनें मिलीं, उन्होंने उसका बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल करके अपना लोहा मनवाया। हमने एक नहीं, बल्कि हर युद्ध में यह साबित किया है। आज अगर जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा हमारे पास है, तो उसमें वायुसेना का बहुत बड़ा योगदान है। हमारे ट्रांसपोर्ट विमानों ने कहीं पुंछ में लैंड किया, कहीं श्रीनगर में लैंड किया, किसी ने अधिक ऊंचाई पर सप्लाई ड्रॉप की, किसी ने दवाइयां और खाना ड्रॉप किया और नागरिकों को बचाया। आजादी की शुरुआत में ही भारतीय वायुसेना ने एक बहुत ही शानदार इतिहास रचा था: राजीव कुमार नारंग

सवाल: पहले के प्रोपेलर वाले विमानों से सुपरसोनिक जेट इंजन के लड़ाकू विमानों तक पहुंचने का सफर हमारी वायुसेना के लिए कैसा था?

जवाब: राजीव कुमार नारंग ने कहा कि हमारे चीफ ऑफ एयर स्टाफ ने हाल ही में कहा है कि हम 2047 तक एक पूरी तरह आत्मनिर्भर एयरफोर्स बनना चाहेंगे। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत का आत्मनिर्भरता का मिशन नया नहीं है, आजादी के महज 4 साल के भीतर, 1951 में ही हमने भारत में अपना पहला ट्रेनर विमान बना लिया था, जिसे हिंदुस्तान ट्रेनर-2 कहा जाता है। एक देश जो लगभग 200 साल तक गुलाम रहा हो, वह आजाद होते ही 4 साल में अपना ट्रेनर विमान बना ले, तो इसके लिए उस देश और हमारे वैज्ञानिकों की तारीफ होनी चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि पायलटों की बात करें, तो उन्होंने देश में बने HT-2 से लेकर कई विदेशी विमान उड़ाए। चाहे वे ईस्टर्न ब्लॉक यानी रूस में बने हों, या वेस्टर्न ब्लॉक अमेरिका, यूके, फ्रांस और पोलैंड में। इतनी विविधता वाले जहाजों को उड़ाना बहुत चुनौतीपूर्ण था। मुझे याद है, पहले जो Dials होते थे, वे रूस वाले विमानों में अलग MKS सिस्टम के होते थे और पश्चिमी देशों के विमानों में अलग। इसके बावजूद, दोनों तरह के फाइटर, ट्रेनर और ट्रांसपोर्ट विमानों को अपनी इन्वेंट्री में रखना और उड़ाना एक बड़ी उपलब्धि है।

राजीव कुमार नारंग बोले, ‘हेलीकॉप्टर्स की बात करें तो रूस के Mi सीरीज और फ्रेंच Alouette दोनों अलग-अलग तरह के थे। फाइटर जेट्स में हमने वैम्पायर, Mystere, मिग-21, 23, 27, 29, सुखोई-30, जगुआर और मिराज-2000 जैसे विमान उड़ाए। ट्रांसपोर्ट में हमने एवरो, डोर्नियर, IL-76 और AN-32 जैसे कई देशों के विमान उड़ाए। इतनी विविधता के बावजूद, अब हम स्वदेशी ट्रेनर उड़ा रहे हैं और स्वदेशी हेलीकॉप्टर्स भी आ गए हैं, जैसे- एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH), लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) और लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (LCH), जो सेना में इंडक्ट हो चुका है।’

उन्होंने कहा कि मेरे हिसाब से यह एक बहुत ही शानदार जर्नी रही है। इसमें चुनौतियां भी रही हैं, लेकिन हम अपनी उपलब्धियों से सीखेंगे और भारत को और मजबूत बनाएंगे। इसी दृष्टिकोण के साथ हम जमीन से जुड़े रहते हुए, भारत की तरफ आंख उठाने वाले किसी भी दुश्मन से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहेंगे।

सवाल: 1965 के युद्ध में पाकिस्तानी पैटन टैंकों को तबाह कर और 1971 की जंग में पूर्वी पाकिस्तान के आकाश में पूरी तरह Air Supremacy हासिल कर भारतीय वायुसेना ने कैसे कमाल किया था?

जवाब: राजीव कुमार नारंग ने कहा, ‘1962 की लड़ाई के बाद पाकिस्तान ने यह मान लिया था कि शायद भारतीय फौज तैयार नहीं है और यह उनकी सबसे बड़ी गलती साबित हुई। लड़ाई की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी, जबकि भारत एक शांतिप्रिय देश था और हमने कोई हमला नहीं किया था। जब उन्होंने अचानक हमला किया, तो स्वाभाविक रूप से हम शुरुआत में तैयार नहीं थे क्योंकि हमारी वैसी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन जब हमला हुआ, तो हमारे जहाजों, पायलटों, थल सेना और नौसेना ने मिलकर ऐसा करारा जवाब दिया कि पाकिस्तान को हर बार वापस भागना पड़ा।’

1965 के युद्ध में तो हमने हाजी पीर पास तक कब्जा कर लिया था। लेकिन भारत का दृष्टिकोण देखिए हम जगह जीतते हैं और फिर वापस कर देते हैं। इस तरह की सद्भावना दुनिया के इतिहास में कहीं और नहीं मिलेगी। इसे हमारी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए, जो मजबूत होता है, वही ऐसा करता है, लेकिन शायद हमें बार-बार ऐसा नहीं करना चाहिए: राजीव कुमार नारंग

राजीव कुमार नारंग ने बताया कि 1971 की बात करें, तो उस समय पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के गवर्नर हाउस पर भारतीय मिग-21 फाइटर्स ने रॉकेट से हमला किया था। उस जमाने में रॉकेट बहुत सटीक हथियार नहीं माने जाते थे, लेकिन हमारे पायलटों ने इतनी सटीकता से फायर किया कि रॉकेट सीधे उस कमरे की खिड़कियों से अंदर जाकर फटे जहां उनकी कॉन्फ्रेंस चल रही थी। इसके बाद उन्होंने तुरंत सरेंडर कर दिया।

उन्होंने कहा, ‘हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 1971 में जब हमारी थल सेना पूर्वी पाकिस्तान में घुसी, तो रास्ते में बहुत सी नदियां और नहरें थीं। अगर हम जमीन के रास्ते चलते, तो शायद इतनी जल्दी आगे नहीं बढ़ पाते। उस समय हमारे हेलीकॉप्टर्स ने एक एयर ब्रिज बनाया और आर्मी को उन जल-बाधाओं के पार कराकर सीधे दुश्मन के पीछे उतार दिया। यह एक ऐसा रणनीतिक कदम था कि पाकिस्तानी सेना चारों तरफ से घिर गई- पीछे, आगे, दाएं और बाएं, हर तरफ भारतीय सेना थी। पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व को कुछ समझ ही नहीं आया। विश्व इतिहास में ऐसी कोई अन्य घटना नहीं है जहां 93 हजार सैनिकों ने एक साथ सरेंडर किया हो।’

राजीव कुमार नारंग ने आगे कहा कि जहां एक ओर भारतीय वायुसेना ने यह उपलब्धि हासिल की, वहीं तीनों सेनाओं का एक बेहतरीन तालमेल था। नौसेना ने भी अपनी तरफ से नाकाबंदी कर दी थी। युद्ध में भारतीय वायुसेना बहुत ही निर्णायक बढ़त देती है। जमीनी लड़ाई में आप दुश्मन से बचकर नहीं निकल सकते, लेकिन एयर ब्रिज का इस्तेमाल करके दुश्मन को चकमा देने की जो क्षमता है, वह सिर्फ वायुसेना ही दे सकती है।आजादी से अब तक भारतीय थल सेना कितनी ताकतवर हुई, क्या रहे बड़े टर्निंग प्वाइंट और आगे कैसा होना चाहिए इसका स्वरूप? स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इसके बारे में रिटायर्ड ब्रिगेडियर अंशुमान नारंग ने विस्तार से बताया।

सवाल: ऐसा कहा जाता है कि कारगिल युद्ध में मिराज-2000 ने लड़ाई की पूरी दिशा बदल दी थी। उसकी सबसे बड़ी ताकत क्या थी और दुनिया ने ऑपरेशन सफेद सागर से क्या सीखा?

जवाब: राजीव कुमार नारंग ने कहा कि कारगिल का युद्ध एक तरह से हमारी पीठ में छुरा घोंपने जैसा था। भारत ने पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था और बदले में हम पर यह हमला हुआ। यह हमला तब हुआ जब स्थिति हमारे लिए प्रतिकूल थी। पहाड़ों की लड़ाई जमीनी लड़ाई से बहुत मुश्किल होती है। जमीन पर अगर 10 लोग लड़ रहे हों, तो पहाड़ पर हमले के लिए उसके सात गुना लोग लगाने पड़ते हैं, और फिर भी जीत की संभावना बहुत कम होती है।

कारगिल में दुश्मन ने अत्यंत ऊंचाई वाली चोटियों पर कब्जा कर लिया था। उस समय दुनिया में प्रिसिजन फायरिंग यानी सटीक मारक क्षमता वाले हथियारों का नया-नया दौर शुरू ही हुआ था। दुनिया के किसी भी देश ने इतनी अधिक ऊंचाई पर उन हथियारों का परीक्षण तक नहीं किया था। ऐसे में भारतीय वायुसेना ने लड़ाई के दौरान ही इनोवेशन किया। हमारे जो पुराने Iron Bombs थे, उनमें लेजर गाइडेड किट लगाई गई। मिराज विमानों ने उनका परीक्षण किया और लगभग 500 से ज्यादा Sorties यानी अचानक हमले किए। पाकिस्तानी इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि उन ऊंचाइयों से उन्हें कोई नहीं हटा सकता। लेकिन जब वायुसेना ने देखा कि सामान्य स्ट्राइक मैकेनिज्म काम नहीं कर रहा है, तो हमने उसे अडॉप्ट किया, मॉडिफाई किया और युद्ध के बीच इनोवेशन किया: राजीव कुमार नारंग

राजीव कुमार नारंग ने बताया कि असली प्रोफेशनलिज्म यही होता है कि विपरीत परिस्थितियों में आप अपनी रणनीति को कैसे बदलते हैं। इसमें हमारा इनोवेशन और Indigenization बहुत काम आया। हमने अपनी पुरानी क्षमताओं को ‘स्मार्ट बम’ में बदलकर दुश्मन पर सटीक प्रहार किया। दुनिया के लिए यह एक बहुत ही निर्णायक और सोची-समझी रणनीतिक योजना थी। अभी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ पर एक नेटफ्लिक्स सीरीज भी आई है, मुझे लगता है कि अब लोगों को भारतीय वायुसेना के शौर्य के बारे में और अधिक पता चलेगा। हमें अपने इतिहास का गहराई से अध्ययन करना चाहिए और उससे सीख लेनी चाहिए।

ये भी पढ़ें- 80वें स्वतंत्रता दिवस पर 75 मिनट तक बोले पीएम मोदी, पढ़िए उनके भाषण की अहम बातें

Tags: 15 AugustExclusiveIAFIAF 80 Years Evolutionindependence dayindian air forceIndian Air Force HistoryOperation Safed Sagarअधकरएकएकककतनकसचनतपरणजटतकदवसननभयनरणयकपखपरपरवबतबतईमयदधरलरहवमनवयसनवलससपरसनकसफरसवततरत
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