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जावेद जाफरी ने अपने चार दशक के करियर में हर तरह के किरदार निभाए हैं, लेकिन ‘माया सभा’ को वह अपने लिए खास फिल्म मानते हैं। उनसे इस अपकमिंग फिल्म को लेकर हुई खास बातचीत… ‘माया सभा’ की स्क्रिप्ट में ऐसा क्या था जिसने आपको तुरंत इस प्रोजेक्ट से जोड़ दिया? जब मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, तो अपने करीब 40 साल के करियर में एक अभिनेता के तौर पर जो स्क्रिप्ट्स मुझे पढ़ने को मिली हैं, उनमें से यह सबसे पावरफुल लगी। सबसे खास बात यह थी कि यह एक कैरेक्टर-ड्रिवन स्क्रिप्ट है, न कि सिर्फ कहानी के सहारे चलने वाली फिल्म। यहां पूरा नैरेटिव मेरे किरदार के इर्द-गिर्द आगे बढ़ता है और उस किरदार में इतने इमोशनल और साइकोलॉजिकल लेयर्स हैं कि एक्टर को बहुत कम ऐसा मौका मिलता है। ईमानदारी से कहूं तो यह नो-ब्रेनर था। सोचने का मौका ही नहीं मिला, बस हां कहना था। इसके साथ-साथ एक अलग तरह का सम्मान भी महसूस हुआ कि निर्देशक ने मुझे इस रोल के लिए सोचा। आमतौर पर लोग मुझे कॉमेडी या डांस से जोड़ते हैं, ऐसे में मुझे एक अभिनेता के रूप में देखने के लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं। टाइटल में ‘माया’ और ‘सभा’ दोनों शब्दों की परतें आपके किरदार से कैसे जुड़ती हैं? ‘माया सभा’ असल में एक इल्यूजन की दुनिया है। यहां जो सिनेमा हॉल है, जो किरदार दिखाई देते हैं, वो वैसे नहीं हैं जैसे पहली नजर में लगते हैं। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है और किरदारों की परतें खुलती हैं, आपको एहसास होता है कि जो दिख रहा था, असलियत उससे बिल्कुल अलग है। यहां ‘सभा’ एक जगह भी है, लोग भी हैं, लेकिन सब कुछ माया यानी भ्रम में लिपटा हुआ है। धीरे-धीरे दर्शक समझता है कि यहां कोई और ही खेल चल रहा है। ‘माया सभा’ आपके करियर की उन फिल्मों में से है जो दर्शक से सोचने की मांग करती हैं? देखिए, कुछ फिल्में होती हैं जो कहती हैं कि आइए, बैठिए, एंटरटेन होइए, टाइम पास कीजिए। लेकिन ‘माया सभा’ में परतें हैं। यह फिल्म रिश्तों की जटिलता दिखाती है-एक पिता और बेटे का रिश्ता, उनके बीच की दूरी, बोझ, दर्द। बाहर से आए दो किरदारों का उनके जीवन में क्या असर पड़ता है, ये सब बहुत धीरे-धीरे सामने आता है। यह जरूरी नहीं कि आपको बहुत गहराई से सोचने की जरूरत पड़े, लेकिन फिल्म का अंदाज ऐसा है कि चीजें धीरे-धीरे रिवील होती हैं। दूसरी बार देखने पर यह फिल्म और ज्यादा एंजॉय होती है। मेरे हिसाब से यह एक बेहद खूबसूरत और अलग दुनिया है, जो इस कहानी के जरिए रची गई है। इस फिल्म में आपका किरदार क्या किसी मानसिक दुविधा से भी गुजरता है? यह किरदार कई तरह के बोझ अपने भीतर लिए हुए है। उसकी जिंदगी में क्या-क्या बीत चुका है-पत्नी का छोड़कर जाना, बेटे के साथ उलझा रिश्ता, करियर में उतार-चढ़ाव, पैसों और फिल्मों को लेकर असफलताएं—ये सब धीरे-धीरे सामने आता है। दर्शक भी कन्फ्यूज रहता है कि यह इंसान आखिर है क्या—नेगेटिव है, पॉजिटिव है, पागल है, होश में है, या किसी को मैनिपुलेट कर रहा है? जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, आपको समझ आता है कि यह किरदार किस दिशा में जा रहा है और उसकी मानसिक स्थिति क्या है। क्या आपको लगता है कि आज ऐसी फिल्में मेनस्ट्रीम में कम बन रही हैं? आज मेनस्ट्रीम का मतलब ही बदल गया है। लोग उसे मेनस्ट्रीम कहते हैं जो ज्यादा पैसा कमाती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि वही सिनेमा का असली पैमाना हो। ‘माया सभा’ में कोई पारंपरिक फॉर्मूला नहीं है—न हीरो-विलेन, न गाने-डांस। यह एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर है, एक रात की कहानी है, चार किरदार हैं और एक थिएटर है। इसके बावजूद आप एक सेकंड के लिए भी बोर नहीं होते। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी राइटिंग है। यही इस फिल्म का असली हीरो है। क्या यह रोल आपको एक अभिनेता के तौर पर आपको कंफर्ट जोन से बाहर ले गया? नहीं देखिए, अगर एक अभिनेता हमेशा अपने कंफर्ट जोन में ही काम करता रहे, तो वह बेहतर कैसे बनेगा? जब तक चुनौती नहीं होगी, तब तक परफॉर्मेंस भी आगे नहीं बढ़ सकती। अगर मैं वही करता रहूं, जो मैं सालों से करता आ रहा हूं, तो इसमें नया क्या रह जाएगा? एक अभिनेता के तौर पर ज़रूरी है कि आप ऐसे रोल्स चुनें जो आपको चैलेंज करें, जहां आप यह सोचें कि मैं इस किरदार को कैसे निभाऊं, उसे कैसे गढ़ूं और उसमें खुद को पूरी तरह शामिल कर सकूं। जब दर्शक यह कहें कि “ये हमने जावेद जाफरी को पहले कभी ऐसे करते नहीं देखा,” तो वही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। मैं ऊपर वाले का शुक्रगुजार हूं कि मुझे अलग-अलग तरह के किरदार निभाने के मौके मिले। माया सभा का यह किरदार उसी तरह का था, जो मुझे मेरे कंफर्ट जोन से बाहर लेकर गया। चाहे फिल्म सलाम नमस्ते हो, ‘धमाल’ सीरीज हो, ‘ओह डार्लिंग! ये है इंडिया!’ जैसी फिल्म हो या ‘बूगी वूगी’ डांस शो हो। या फिर ‘ताकेशी कैसल’ में सिर्फ आवाज़ के ज़रिए लोगों से जुड़ना, इन सभी अनुभवों ने मुझे एक कलाकार के तौर पर लगातार कुछ नया करने का मौका दिया। मेरे लिए यह ‘छाप छोड़ने’ से ज़्यादा अपनी कला का प्रदर्शन है कि एक अभिनेता के तौर पर मैं किसी किरदार को अपनी नजर से कैसे पेश कर सकता हूं। डायरेक्टर और राइटर की अपनी सोच होती है, लेकिन एक अभिनेता के रूप में मैं उस किरदार में क्या जोड़ सकता हूं, यही मेरे लिए सबसे अहम है। पिछले 40 सालों में अगर मुझे इतना कुछ करने का अवसर मिला है, तो इसके लिए मैं सच में ऊपर वाले का शुक्रगुजार हूं। डारेक्टर राही अनिल बर्वे के साथ क्या क्रिएटिव डिस्कशन होता रहा सेट पर? यह करीब 22 दिनों की बेहद इंटेंस शूटिंग थी। कई बार 18-19 घंटे, यहां तक कि 22 घंटे तक काम किया। सिनेमा हॉल के अंदर धुआं, धूल, केरोसीन—हालात मुश्किल थे, एलर्जी भी हुई, लेकिन अंत में जो सटिस्फैक्शन मिलता है, वही सब कुछ भुला देता है। दर्शक को इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने कितने टेक लिए या बजट कितना था। उन्हें सिर्फ एंड रिजल्ट दिखता है और अगर रिजल्ट अच्छा हो, तो एक कलाकार के तौर पर वही सबसे बड़ी खुशी है।






































