शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए जल्द ही बड़ी खुशखबरी आ सकती है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ऐसे बदलावों पर काम कर रहा है, जिससे शॉर्ट सेलिंग पहले के मुकाबले आसान हो जाएगी। इसके तहत शेयर उधार लेने और देने की सुविधा वाले शेयरों की संख्या लगभग दोगुनी की जा सकती है। साथ ही निवेशकों के लिए जरूरी कोलेटरल (गारंटी राशि) की शर्तों में भी राहत देने की तैयारी है।
क्या बदलने की तैयारी है?
फिलहाल नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में करीब 2,600 कंपनियां लिस्टेड हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 176 शेयरों में ही स्टॉक लेंडिंग और बोर्रोइंग की सुविधा उपलब्ध है। अब SEBI इस संख्या को काफी बढ़ाने की प्लानिंग बना रहा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लिक्विड शेयर इस दायरे में आ सकें। इसके अलावा, शेयर उधार लेने के लिए निवेशकों को जो अधिक कोलेटरल देना पड़ता है, उसमें भी कमी की जा सकती है। भारत में यह जरूरत कई मामलों में 130% तक होती है, जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में यह करीब 100% है।
आखिर क्या होती है शॉर्ट सेलिंग?
शॉर्ट सेलिंग ऐसी ट्रेडिंग स्ट्रैटेजी है, जिसमें निवेशक पहले शेयर उधार लेकर बेचता है। अगर बाद में उस शेयर की कीमत गिर जाती है तो वह उसे कम दाम पर खरीदकर वापस कर देता है और बीच का अंतर उसका मुनाफा बन जाता है। यानी इसमें शेयरों की गिरती कीमत से भी कमाई की जा सकती है।
SEBI क्यों कर रहा है यह बदलाव?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग तेजी से बढ़ी है। लेकिन SEBI के अनुसार, करीब 90% छोटे निवेशकों को डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में नुकसान होता है। इसलिए नियामक चाहता है कि निवेशक ज्यादा सुरक्षित माने जाने वाले कैश इक्विटी मार्केट की ओर लौटें। SEBI का मानना है कि यदि स्टॉक लेंडिंग और बोर्रोइंग (उधार देना और लेना) की सुविधा आसान होगी, तो कैश मार्केट में कारोबार बढ़ेगा और निवेशकों को डेरिवेटिव्स के मुकाबले बेहतर और कम रिस्क वाले ऑप्शन मिलेंगे।
कब तक लागू हो सकते हैं नए नियम?
सूत्रों के मुताबिक, SEBI इस प्रस्ताव पर लगातार चर्चा कर रहा है और इस साल के अंत तक नए नियमों का अंतिम मसौदा तैयार किया जा सकता है। हालांकि, नियामक की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।





































