
आज के समय में अभी खरीदें, बाद में चुकाएं का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल से लेकर कार और घर तक सब कुछ आसान EMI पर उपलब्ध है। छोटी-छोटी किश्तें शुरुआत में बेहद हल्की लगती हैं, लेकिन अगर सही प्लानिंग न हो तो यही सुविधा धीरे-धीरे भारी लोन में बदल सकती है। फाइनेंस एक्सपर्ट्स ऐसे में 2-6-10 नियम अपनाने की सलाह देते हैं, जो EMI लेने से पहले आपकी फाइनेंशियल हेल्थ की सही जांच कर सकता है।
क्या है 2-6-10 नियम?
यह एक आसान फॉर्मूला है, जो बताता है कि कोई सामान या लोन आपकी आय के हिसाब से सही है या नहीं। अगर इस नियम को फॉलो किया जाए तो अनावश्यक कर्ज से बचा जा सकता है।
‘2’ का मतलब
नियम का पहला हिस्सा कहता है कि जिस चीज को आप EMI पर खरीदना चाहते हैं, उसकी कुल कीमत आपकी एक महीने की सैलरी के आधे से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। मान लीजिए आपकी सैलरी ₹50,000 है, तो ₹25,000 से महंगा मोबाइल लेना समझदारी नहीं मानी जाएगी। खासकर इलेक्ट्रॉनिक सामान की कीमत तेजी से गिरती है। एक साल के भीतर ही उसका वैल्यू काफी कम हो जाता है। ऐसे में महंगे गैजेट्स पर ज्यादा खर्च करना आर्थिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।
‘6’ का मतलब
दूसरा नियम कहता है कि EMI का कार्यकाल छह महीने से अधिक नहीं होना चाहिए। 18 या 24 महीनों की लंबी किश्तें आपको लंबे समय तक कर्ज में बांधे रखती हैं। इसके अलावा, लंबी अवधि का मतलब ज्यादा ब्याज। कम अवधि की EMI से आप जल्दी कर्जमुक्त हो सकते हैं और भविष्य की वित्तीय जरूरतों के लिए तैयार रह सकते हैं।
‘10’ का मतलब
तीसरा और सबसे अहम नियम यह है कि आपकी कुल मासिक EMI आपकी इन-हैंड सैलरी के 10% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर आपकी सैलरी ₹40,000 है तो आपकी EMI ₹4,000 से अधिक नहीं होनी चाहिए। इससे घर का मासिक बजट संतुलित रहता है और बचत पर असर नहीं पड़ता।
क्यों जरूरी है यह नियम?
विशेषज्ञों का कहना है कि आसान लोन की आदत धीरे-धीरे वित्तीय दबाव बढ़ा सकती है। कई लोग छोटी-छोटी EMI जोड़ते-जोड़ते बड़ी जिम्मेदारी उठा लेते हैं, जिसका असर उनकी बचत और इमरजेंसी फंड पर पड़ता है।







































