58 मिनट पहले
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राज कपूर को हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा शोमैन माना जाता था, लेकिन उनकी कामयाबी के पीछे एक ऐसे कवि का योगदान था, जो खुद परदे पर बहुत कम आया, जिनका नाम शैलेन्द्र है।
राज कपूर उन्हें “कविराज” और “पुष्किन” कहते थे। वे अक्सर उनके पैरों के पास बैठकर गीत सुनते थे।
शैलेन्द्र का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उनका जन्म 1923 में हुआ। वह रेलवे में नौकरी करते थे और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) के मुशायरों में कविता पढ़ते थे। यहीं राज कपूर ने उनकी प्रतिभा देखी। कपूर ने उन्हें काम ऑफर किया, लेकिन शैलेन्द्र ने पहले मना कर दिया। बाद में पत्नी की प्रेग्नेंसी के समय पैसों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपने कुछ गीत दिए। ये गाने फिल्म ‘बरसात’ (1949) का हिस्सा बने और RK Films की पहचान बन गए।

राज कपूर ने मुशायरे में शैलेंद्र की कविता ‘जलता है पंजाब’ सुनी, प्रभावित होकर अपनी फिल्म ‘आग’ (1948) के लिए खरीदने का प्रस्ताव दिया था।
जल्द ही शैलेन्द्र RK स्टूडियो से जुड़ गए। उन्हें हर महीने 500 रुपए की तय सैलरी मिलती थी, चाहे वह एक गाना लिखें या पांच। पैसों से ज्यादा उनके लिए उनके आदर्श मायने रखते थे। उनके लिखे गीत आवारा हूं, मेरा जूता है जापानी, प्यार हुआ इकरार हुआ आम आदमी की जुबान पर चढ़ गए।
शैलेन्द्र के बेटे ने एक बार बताया था कि राज कपूर उनके पैरों के पास बैठकर उन्हें हमेशा “पुष्किन” कहा करते थे, लेकिन शैलेन्द्र जमीन से जुड़े रहे। वह अपनी कमाई का हिस्सा संगीतकारों और टेक्नीशियनों के साथ बांट देते थे।
करियर के शिखर पर उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन की कोशिश की। उन्होंने फिल्म ‘तीसरी कसम’ (1966) प्रोड्यूस की जिसमें राज कपूर और वहीदा रहमान थे। यह फिल्म एक साल में पूरी होनी थी, लेकिन पांच साल लग गए। फिल्म की शुरुआत 2-3 लाख रुपए के बजट से हुई थी, लेकिन पांच साल बाद जब फिल्म पूरी हुई तो बजट बढ़कर 22-23 लाख रुपए हो गया और शैलेन्द्र पर काफी कर्ज हो गया। फिल्म रिलीज हुई तो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही और इससे उन्हें गहरा झटका लगा।

14 दिसंबर 1966 को, जो राज कपूर का जन्मदिन था, उसी दिन शैलेन्द्र का निधन हो गया। वह सिर्फ 43 साल के थे और लिवर सिरोसिस से जूझ रहे थे।
उनका आखिरी लिखा गीत ‘जीना यहां मरना यहां फिल्म मेरा नाम जोकर (1970) में आया, जो उनकी मौत से पहले रिकॉर्ड हो चुका था।
राज कपूर ने उनकी मृत्यु पर धर्मयुग मैगजीन पर लिखा था “मेरी आत्मा शैलेन्द्र के साथ थी। हमारा रिश्ता जन्मों का था।”







































