देश की प्राइवेट बीज कंपनियों ने खरीफ फसल सत्र के लिए 20 से 30 प्रतिशत अतिरिक्त भंडार रखा है। लेकिन, इस साल अल-नीनो के कारण मानसून के कमजोर पड़ने और देरी से आने के खतरे के बीच बारिश की कमी वाले मुख्य इलाकों में समय पर बीज पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) ने शनिवार को ये बात कही। FSII के चेयरमैन अजय राणा ने कहा कि मक्का, धान और मोटे अनाज (मिलेट्स) के रिकॉर्ड बीज उत्पादन से इस साल उद्योग पूरी तरह तैयार है।
पहले ही बीज खरीद चुके हैं 75 प्रतिशत किसान
उन्होंने बताया कि हाल ही में एक हजार किसानों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि 75 प्रतिशत किसान पहले ही बीज खरीद चुके हैं, जबकि 25 प्रतिशत किसान मानसून का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में बुवाई की अवधि खत्म होने से पहले अतिरिक्त भंडार वाले क्षेत्रों से प्रभावित जिलों तक बीज पहुंचाना बहुत महत्वपूर्ण होगा। राणा ने पीटीआई के साथ की गई बातचीत में कहा, ”हम आमतौर पर 15 से 20 प्रतिशत बफर रखने की योजना बनाते हैं, लेकिन इस साल बेहतर उत्पादन के कारण कई कंपनियों के पास 20 से 30 प्रतिशत तक अतिरिक्त बीज उपलब्ध है।”
देश में 11.2 प्रतिशत अतिरिक्त बीज उपलब्ध
अजय राणा ने कहा कि चुनौती बीज की उपलब्धता नहीं, बल्कि सही समय पर सही क्षेत्रों तक उसकी सप्लाई सुनिश्चित करना है। सरकार के अनुसार, खरीफ मौसम के लिए प्रमाणित बीज की उपलब्धता 192.43 लाख क्विंटल है, जबकि आवश्यकता लगभग 173 लाख क्विंटल है। इस प्रकार 11.2 प्रतिशत अतिरिक्त बीज उपलब्ध है। निजी क्षेत्र देश में 10 लाख से ज्यादा खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से लगभग 70 प्रतिशत बीज की आपूर्ति करता है और उसने इसके अतिरिक्त भी पर्याप्त भंडार तैयार किया है।
सरकार ने की अल नीनो से प्रभावित होने वाले 315 संभावित जिलों की पहचान
सरकार ने अल नीनो से प्रभावित होने वाले 12 राज्यों के 315 संभावित जिलों की पहचान की है। अजय ने कहा, ”अल नीनो हमारी खेती, खासकर खरीफ के मौसम के लिए अच्छी खबर नहीं है। इसका असर खासकर उन इलाकों पर पड़ेगा जहां सिंचाई की सुविधा कम है।”
जल्दी और मध्यम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों की ओर रुख कर रहे किसान
उन्होंने कहा कि ज्यादातर फसलों में किसान अब जल्दी और मध्यम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों की ओर रुख कर रहे हैं तथा उद्योग ने उसी अनुरूप बीज का भंडारण किया है। एफएसआईआई की सदस्य कंपनियों ने रिमोट सेंसिंग टूल्स और डिजिटल मंच की मदद से संवेदनशील जिलों की पहचान कर वास्तविक समय में निगरानी शुरू कर दी है। राणा ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती अतिरिक्त भंडार वाले क्षेत्रों से जरूरत वाले जिलों तक बीज पहुंचाने के लिए जमीनी स्तर पर बेहतर समन्वय स्थापित करना है।
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