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    litton das returns for the test against australia a bold move for bangladesh cricket

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जीतेंद्र@84, कभी हीरोइन के स्टंट किए, फिर बने स्टार:रेखा को टाइमपास कहा, सरेआम फूट-फूटकर रोईं, महमूद ने हंसाने के लिए उतारी पेंट, जानिए किस्से

by Dainik Mirror
April 6, 2026
in Entertainment
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जीतेंद्र@84, कभी हीरोइन के स्टंट किए, फिर बने स्टार:रेखा को टाइमपास कहा, सरेआम फूट-फूटकर रोईं, महमूद ने हंसाने के लिए उतारी पेंट, जानिए किस्से
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हिंदी सिनेमा के जंपिंग जैक कहे जाने वाले जीतेंद्र आज 84 साल के हो गए हैं। कभी मुंबई की चॉल में 10×12 की खोली में रहने वाले जीतेंद्र आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। मिडिल क्लास परिवार में जन्में जीतेंद्र आर्टिफिशियल जूलरी सप्लाई करने में पिता का हाथ बंटाते थे। एक रोज वो सेट पर जूलरी पहुंचाने गए, जहां उन्हें जूनियर आर्टिस्ट का काम मिला। तनख्वाह थी 100 रुपए महीना। उस दिन जीतेंद्र का फिल्मों से ऐसा रिश्ता जुड़ा कि उन्होंने पहले जूनियर आर्टिस्ट से बतौर लीड हीरो काम किया और फिर हिंदी सिनेमा के स्टार बने। ये रिश्ता 200 से ज्यादा फिल्मों और 5 लाइफटाइम अचीवमेंट्स अवॉर्ड्स के साथ आज भी कायम है। आज जीतेंद्र के 84वें जन्मदिन के खास मौके पर जानिए उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ मजेदार और अनसुने किस्से- खोली में पंखा लगा, तो पूरा चॉल देखने पहुंचा जीतेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 में अमृतसर के एक पंजाबी परिवार में हुआ। जन्म के समय उनका नाम रवि कपूर रखा गया, जो बाद में फिल्मों में आकर जीतेंद्र हुआ। जीतेंद्र कुछ महीनों के ही थे, जब परिवार मुंबई आकर बस गया और गिरगांव की श्याम सदन चॉल में रहने लगा। 8 लोगों का पूरा परिवार 10 बाय 12 की खोली में रहता था, जिसका भाड़ा था 6 रुपए। उनके पिता अमरनाथ फिल्मों के सेट में आर्टिफिशियल जूलरी सप्लाई करने का काम करते थे। समय के साथ जब घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी तो उनके घर में ट्यूबलाइट और पंखा लगा। चॉल में गरीबी का वो आलम था कि पूरे चॉल के लोग उनके घर वो पंखा और ट्यूबलाइट देखने पहुंचे थे। जिंदगी के 20 साल जीतेंद्र ने उसी चॉल में गुजारे। पंजाबी परिवार से होने के बावजूद आसपास के माहौल में घुल-मिलकर उन्होंने फर्राटेदार मराठी बोलना सीख लिया। सेट पर जूलरी सप्लाई करते हुए बने जूनियर आर्टिस्ट जीतेंद्र न पढ़ाई में अच्छे थे न उनके पास कोई खास टैलेंट या रुचि थी। शुरुआती पढ़ाई जैसे-तैसे पूरी की, तो पिता ने अपने आर्टिफिशियल जूलरी के बिजनेस में लगा दिया। काम था फिल्मों के सेट पर जूलरी पहुंचाना। साल 1959 में जीतेंद्र को वी.शांताराम की फिल्म नवरंग के सेट पर जूलरी पहुंचाने का काम मिला। वो रोज बस में धक्के खाते हुए सेट पर पहुंचते थे। उम्र करीब 17 साल थी। एक रोज चकाचौंध देखकर जीतेंद्र को भी फिल्म देखने का मन किया। उन्होंने वहां खड़े लोगों से पूछा तो उन्हें साफ इनकार कर दिया गया। सबने कहा कि वी.शांताराम किसी को शूटिंग देखने की इजाजत नहीं देते। जीतेंद्र मुंह लटकाए घर पहुंचे और चाचा से शिकायत की। अगले दिन चाचा उन्हें लेकर फिर सेट पर पहुंचे और असिस्टेंट से कहा कि मेरे भतीजे को शूटिंग देखनी है। उन्होंने जवाब दिया, ‘शूटिंग देखना है, तो काम भी करना पड़ेगा।’ उन्होंने जीतेंद्र को देखा और कहा- ‘हम तुम्हें प्रिंस का रोल देंगे।’ जीतेंद्र की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। रोज बस से जाने वाले जीतेंद्र अगले दिन टैक्सी में सेट पर पहुंचे। वहां पहुंचते ही उन्हें प्रिंस के कपड़े पहनाए गए, लेकिन जैसे ही वो सेट पर पहुंचे उन्हें जोरदार धक्का लगा। सेट पर वो अकेले प्रिंस नहीं थे, बल्कि वहां 200 प्रिंस बने लड़के बैठे थे। उन्हें फिल्म नवरंग के गाने तू छुपी है कहां में हीरोइन के पीछे खड़े होने वाले जूनियर आर्टिस्ट का काम मिला था। वी.शांताराम से मांगा काम, बना दिया गया हीरोइन का बॉडी डबल नवरंग की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र ने खुद भी फिल्मों में काम करने का मन बना लिया। जब उन्हें 1963 में फिल्म सेहरा के सेट पर जूलरी पहुंचाने का काम मिला, तो एक दिन उन्होंने मौका पाते ही डायरेक्टर वी.शांताराम से मराठी में कहा- मुझे फिल्मों में काम करना है। वी.शांताराम ने उनकी बात से ज्यादा इस बात पर गौर किया कि एक पंजाबी कपूर साहब का लड़का इतनी अच्छी मराठी कैसे बोल रहा है। इस तरह बात चल निकली। उन्होंने जाते हुए कहा, मैं गारंटी नहीं देता, लेकिन तुम ट्राय करते रहो। इस एक बात की बदौलत जीतेंद्र को फिल्म सेहरा में ही एक्स्ट्रा का काम मिल गया। उन्हें बस सेट पर मौजूद रहना होता था, जिससे अगर कोई जूनियर आर्टिस्ट न आए, तो वो उनकी जगह खड़े हो सकें। इस काम के लिए जीतेंद्र को महीने के 100 रुपए तनख्वाह मिली। एक दिन फिल्म के एक सीन के लिए एक्ट्रेस संध्या को आग के ऊपर से कूदता दिखाना था। एक्ट्रेस संध्या, डायरेक्टर वी.शांताराम की पत्नी थी। उस दौर में आम तौर पर खतरनाक सीन करने के लिए एक्टर-एक्ट्रेसेस के बॉडी डबल रखे जाते थे, जो उन्हीं की तरह तैयार होकर खतरनाक स्टंट करते थे। उस दिन भी सेट पर एक बॉडी डबल बुलाई गई थी, लेकिन आग देखकर उसने सीन करने से इनकार कर दिया। इसके लिए एक्ट्रेस की बॉडी डबल बनने के लिए एक लड़की बुलाई गई थी। आग की लपटें देख वो लड़की डर गई और वहां से चली गई। सेट पर मौजूद जब कोई लड़की वो सीन करने के लिए राजी नहीं हुई तो वी.शांताराम ने जीतेंद्र को ही ये काम दे दिया। जीतेंद्र को एक्ट्रेस संध्या की तरह तैयार किया गया, जिसके बाद उन्होंने हीरोइन बनकर सीन किया। पहला डायलॉग ही नहीं बोल पाए जीतेंद्र, चिढ़ गए फिल्म के डायरेक्टर इस एक रोल से जीतेंद्र ने वी.शांताराम के दिल में घर लिया। उन्हें इस फिल्म में एक डायलॉग भी दिया गया। उन्होंने कहना था, सरदार, दुश्मनों का दल टिड्डियों की तरह आगे बढ़ रहा है। 25 रीटेक के बावजूद जीतेंद्र डायलॉग ठीक तरह नहीं बोल पाए। खिजियाकर वी.शांताराम ने वो गलत डायलॉग ही फिल्म में फाइनल कर लिया। वो वी.शांताराम ही थे, जिन्होंने जीतेंद्र का हुनर परखा और उन्हें फिल्म गीत गाया पत्थरों ने में लीड रोल दिया। पहली फिल्म देखने पेरेंट्स के साथ पहुंचे, खाली पड़ा था थिएटर जीतेंद्र की बतौर हीरो पहली फिल्म गीत गाया पत्थरों ने साल 1964 में रिलीज हुई। चॉल में रहने वाले जीतेंद्र के लिए ये खास दिन था। उन्होंने चॉल के पास स्थित एक थिएटर में पिता अमरनाथ और मां कृष्णा को फिल्म दिखाने के लिए तीन टिकटें खरीदीं। थिएटर पहुंचते ही उन्होंने टिकट देखने के लिए गेट पर खड़े शख्स से पूछा, हमें कहां बैठना है। जवाब मिला, पूरा थिएटर खाली है, जहां बैठना है बैठ जाओ। ये फिल्म खास नहीं चली, लेकिन जीतेंद्र ने ठान लिया कि अब वो फिल्मों में ही करियर बनाएंगे। लड़की को लाइन मारने के चक्कर में दोस्त को फंसाया जीतेंद्र पहली फिल्म फ्लॉप होने के बाद प्रोड्यूसर्स के दफ्तरों के चक्कर काटते हुए फिल्में मांगा करते थे। वो संघर्ष के दिनों में कोलाबा की ऊषा सदन बिल्डिंग में रहने पहुंचे, जहां एक्टर प्रेम चोपड़ा भी रहा करते थे। उस दौर में प्रेम चोपड़ा नौकरी भी करते थे और फिल्मों में काम की तलाश में थे। फिल्मों में छोटा-मोटा काम करते हुए जीतेंद्र ने कार खरीद ली थी, प्रेम चोपड़ा के पास भी कार हुआ करती थी। दोनों एक ही समय पर घर से निकलते और प्रोड्यूसर्स के दफ्तरों के बाहर टकराते रहते थे। लेकिन एक-दूसरे के सामने खुदको रईस और व्यस्त दिखाते थे। एक रोज प्रेम चोपड़ा ने जीतेंद्र से पूछ ही लिया, हम दोनों एक साथ निकलते हैं, एक ही जगह जाते हैं, क्यों न हम ये दिखावा छोड़कर एक ही गाड़ी से आएं-जाएं, इससे पैसे भी बच जाएंगे। तंगी में गुजारा कर रहे जीतेंद्र भी झट से मान गए तब से दोनों साथ घरों से निकलते लगे। तय हुआ कि एक दिन का खर्च एक शख्स उठाएगा और दूसरे दिन दूसरा शख्स खर्च करेगा। 1965 में एक दिन कार से जाते हुए दोनों की नजरें एक सुंदर लड़की पर पड़ी। वो अपनी सहेली के साथ कहीं जा रही थी। दोनों ने हिम्मत कर लड़की को लिफ्ट देने का पूछा और वो भी मान गई। जीतेंद्र ने चालाकी से उस सुंदर लड़की को अपने साथ पीछे की सीट पर बैठा लिया और उसकी सहेली, कार चला रहे प्रेम चोपड़ा के बाजू वाली सीट पर बैठी। ये देखकर प्रेम चोपड़ा खिजिया उठे और बड़बड़ाते हुए गाली देने लगे। पीछे बैठी सुंदर लड़की ने जीतेंद्र से पूछा, ‘ये क्या कह रहे हैं?’ जीतेंद्र तो जीतेंद्र थे, उन्होंने कहा कि प्रेम चोपड़ा आगे बैठी लड़की को पसंद करते हैं। ये सुनकर प्रेम चोपड़ा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, लेकिन उन लड़कियों को बुरा न लगे, इसलिए प्रेम चोपड़ा को न चाहते हुए भी हां में हां मिलाना पड़ा। लड़कियों को फिल्म दिखाने पहुंचे, खिलाने के पैसे नहीं थे तो इंटरवल में भाग निकले लिफ्ट के चक्कर में जीतेंद्र ने दोनों लड़कियों को साथ फिल्म देखने के लिए राजी कर लिया। चारों मिलकर धर्मेंद्र की फिल्म नीला आकाश देखने थिएटर पहुंचे। वो रमजान का महीना था, दोनों लड़कियों मुस्लिम थीं और उस दिन उनका रोजा (व्रत) था। उन्होंने जीतेंद्र से कहा कि वो फिल्म देखने के बाद उनके साथ रोजा खोलेंगी और कुछ खाएंगी। इंटरवल होते ही प्रेम चोपड़ा, जीतेंद्र को बाहर लेकर गए। उन्होंने कहा, मेरे पास पैसे नहीं हैं, कैसे खिलाएंगे। जीतेंद्र ने भी कहा, मेरे पास भी पैसे नहीं हैं। दोनों ने कुछ देर सोचा और बेइज्जती से बचने के लिए दोनों इंटरवल से ही दोनों लड़कियों को थिएटर में छोड़कर भाग निकले। इस वाक्ये के 50 साल बाद, आज भी प्रेम चोपड़ा और जीतेंद्र की दोस्ती कायम है। बी-ग्रेड फिल्मों से आईं मुमताज के साथ नहीं करना चाहते थे काम लंबी जद्दोजहद के बाद जीतेंद्र को वी.शांताराम की अगली फिल्म बूंद जो बन गई मोती में काम मिला। इस फिल्म में वी.शांताराम अपनी बेटी राजश्री को जीतेंद्र के साथ कास्ट कर रहे थे, लेकिन शादी के चलते आखिरी समय में राजश्री को फिल्म छोड़नी पड़ी। तब वी.शांताराम ने फिल्म में मुमताज को कास्ट किया, जो कुछ बी-ग्रेड फिल्मों में आने के बाद मैनस्ट्रीम सिनेमा में जगह बनाने की कोशिश कर रही थीं। इससे पहले वो वी.शांताराम की फिल्मों स्त्री (1961) और सेहरा (1963) में छोटी सी भूमिका निभा चुकी थीं। जैसे ही ये बात जीतेंद्र को पता चली उन्होंने डायरेक्टर से साफ कहा कि वो मुमताज के साथ फिल्म नहीं करेंगे। जीतेंद्र ने खबर मिलते ही वी.शांताराम से कहा-आप मुमताज को क्यों ले रहे हैं। वी.शांताराम ने कहा, क्यों नहीं। उसमें हीरोइन बनने की सारी क्वालिटी हैं। वो सुंदर हैं, अच्छा डांस करती हैं, अच्छी एक्ट्रेस हैं। ये सुनकर जीतेंद्र ने फिर कहा, नहीं, क्या आप किसी और को कास्ट नहीं कर सकते। इस पर जवाब मिला, नहीं, मैं मुमताज को ही लूंगा, तुम्हें नहीं पसंद तो फिल्म छोड़ दो। पहले ही स्ट्रगल कर रहे जीतेंद्र को फिल्म करनी ही पड़ी।
जीतेंद्र को हंसाने के लिए महमूद ने उतार दी थी पैंट एक दिन जीतेंद्र अरुणा ईरानी के साथ एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। शॉट के मुताबिक उन्हें जोर-जोर से हंसना था, लेकिन बार-बार कोशिश करने के बावजूद उन्हें हंसी नहीं आ सकी। ये देखकर कॉमेडियन महमूद उनके पास पहुंचे और कहा कि जैसे ही शॉट शुरू हो, बस मेरी तरफ देख लेना। ये कहते ही महमूद साहब पास बने एक दरवाजे के पीछे खड़े हो गए। जैसे ही शॉट शुरू हुआ, जीतेंद्र की नजर दरवाजे पर पड़ी और वो जोर दार हंस पड़े। महमूद साहब वहां पैंट उतारकर खड़े थे। ये किस्सा जीतेंद्र ने कपिल शर्मा शो में सुनाया था। फिल्म फ्लॉप होने के डर से खुद खरीद लिए सारे टिकट साल 1967 में जीतेंद्र की तीन फिल्में बंद जो बन गई मोती, गुनाहों का देवता और फर्ज। गुनाहों का देवता मई 1967 में रिलीज हुई और कुछ खास नहीं चली। इसके बाद अक्टूबर 1967 में उनकी दूसरी फिल्म फर्ज आई। जीतेंद्र पहले ही इस फिल्म को साइन करने में झिझक रहे थे। वजह ये थी कि इस फिल्म के डायरेक्टर रविकांत नागाइच थे। वो साउथ फिल्मों के सिनेमैटोग्राफर थे और फिल्म फर्ज से वो बतौर डायरेक्टर बॉलीवुड में कदम रखने वाले थे। नए डायरेक्टर के साथ काम करने के लिए एक्टर्स इनकार कर चुके थे, जिसके बाद फिल्म जीतेंद्र को मिली थी। जब फिल्म रिलीज हुई तो कुछ दिनों तक सिनेमाघर खाली पड़े थे। जीतेंद्र डर गए कि अभी तो करियर शुरू हुआ है, अगर फिल्म इंडस्ट्री में खबर फैल गई कि जीतेंद्र की ये फिल्म भी फ्लॉप हो गई, तो कोई उन्हें आगे साइन नहीं करेगा। उस दौर में जब टिकट के दाम 60 पैसे तक हुआ करते थे, तब जीतेंद्र ने 5 हजार रुपए लगाकर अपनी फिल्म की सारी टिकटें खरीद लीं। जिससे लोगों को लगे कि सिनेमाघरों में टिकट नहीं मिल रहीं। वाकई यही हुआ। जब लोगों को पता चला कि फिल्म हाउसफुल है, तो उनमें भी फिल्म देखने का क्रेज बढ़ने लगा और लोग बढ़-चढ़कर फिल्म देखने जाने लगे। कुछ समय बाद वाकई फिल्म हाउसफुल होने लगी। इस फिल्म से जीतेंद्र को रातोंरात पहचान मिल गई। वजह थी, फिल्म के सुपरहिट गाने और जीतेंद्र का नया स्टाइल। फिल्म का गाना मस्त बहारों का मैं आशिक जबरदस्त हिट रहा। फिल्म में उनके पहने गए कपड़े और जूते भी नया ट्रेंड लाए। हेमा मालिनी पसंद आईं, तो संजीव कुमार के लव लेटर में लिखा अपना नाम एक दौर में एक्टर संजीव कुमार, ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी को पसंद करते थे। तब वो पहले ही धर्मेंद्र के साथ रिलेशनशिप में थीं। परिवार के ऐतराज के चलते हेमा मालिनी ने धर्मेंद्र से दूरी बना ली थी, तब संजीव कुमार ने प्यार का इजहार करने के लिए हेमा मालिनी को लव लेटर लिखा था। लेटर पहुंचाने में झिझक महसूस हुई, तो उन्होंने ये जिम्मेदारी दोस्त जीतेंद्र को सौंप दी। जीतेंद्र जैसे ही लेटर लेकर पहुंचे, तो उनका हेमा को देखकर मन बदल गया। उन्होंने मौका देखकर लव लेटर से संजीव कुमार का नाम हटा दिया और अपना नाम लिख दिया। वो लेटर देकर लौट गए। जब ये बात हेमा मालिनी के घरवालों को पता चली, तो उन्होंने जीतेंद्र के साथ उनकी शादी की बात चलाना शुरू कर दी। वजह ये रही कि हेमा का परिवार नहीं चाहता था कि उनकी शादी धर्मेंद्र से हो, संजीव कुमार भी परिवार को पसंद नहीं थे, लेकिन हेमा का दोनों से ध्यान भटकाने के लिए परिवार ने उनकी शादी जीतेंद्र से पक्की कर दी। जबकि उस समय जीतेंद्र भी एयरहोस्टेस शोभा कपूर से सगाई कर चुके थे। एक रोज हेमा-जीतेंद्र की शादी के लिए पंडित बुलाया गया, जैसे ही बात धर्मेंद्र तक पहुंची, वो शोभा कपूर के साथ वहां पहुंच गए और शादी रुकवा दी। जीतेंद्र ने 1974 में एयरहोस्टेस शोभा कपूर से लव मैरिज की थी। शादी से पहले दोनों कई सालों तक रिलेशनशिप में भी रहे थे। कहा जाता है दोनों की मुलाकात सालों पहले मरीन ड्राइव पर हुई थी, जब शोभा महज 14 साल की थीं। दोनों की दोस्ती हुई और दोनों की अक्सर मुलाकातें होने लगीं। कपल के दो बच्चे एकता कपूर और तुषार कपूर हैं। करवाचौथ पर पत्नी की जिद ने बचाई थी जान 1975 की बात है जब शोभा ने जीतेंद्र की लंबी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत रखा। उसी दिन जीतेंद्र को शूटिंग के लिए फ्लाइट से निकलना था। फ्लाइट लेट हुई तो जीतेंद्र शोभा का व्रत खुलवाने घर आ गए। फ्लाइट का टाइम होने लगा तो जीतेंद्र निकलने को हुए, लेकिन शोभा ने जिद कर उन्हें घर पर ही रोक लिया। पत्नी की जिद देखकर जीतेंद्र ने अपने मेकअप आर्टिस्ट को भी वापस बुला लिया और कहा अगले दिन निकलेंगे। कुछ समय बाद जीतेंद्र की नजर एयरपोर्ट की तरफ गई, जो पाली हिल इलाके से दिखता था। उन्हें उस तरफ आग लगी नजर आई। कुछ समय बाद खबर मिली कि जिस इंडियन एयरलाइन की फ्लाइट से वो जाने वाले थे वो क्रैश हो गई है। ये किस्सा जीतेंद्र ने कपिल शर्मा शो में सुनाया था। जीतेंद्र का ऑटोग्राफ लेने आए बच्चों की कर दी थी एकता ने पिटाई जीतेंद्र हर साल अपने बच्चों तुषार और एकता को एक महीने के लिए देश से बाहर घुमाने ले जाते थे। एक बार की बात है जब फैमिली जिम्बाब्वे गया। जैसे ही जीतेंद्र एयरपोर्ट से बाहर निकले, तो कुछ बच्चे उनका ऑटोग्राफ लेने दौड़े चले आए। ये देखते ही बेटी एकता ने जूता उतारकर उनकी पिटाई करना शुरू कर दिया। एक नजर फिल्मी सफर पर- जीतेंद्र ने 6 दशकों के फिल्मी सफर में करीब 200 फिल्मों में काम किया है। कारवां, बिदाई, धरम वीर, स्वर्ग नर्क, जानी दुष्मन, फर्ज, हिम्मतवाला, तोहफा, स्वर्ग से सुंदर, खुदगर्ज और थानेदार जैसी फिल्में की हैं। 1972-74 के बीच जीतेंद्र को फिल्मों में काम मिलना कम हो गया था, जिससे वो जॉबलेस हो गए। जीतेंद्र ने अपनी सालों की कमाई लगाकर 1982 में दीदार-ए-यार फिल्म बनाई जो बुरी तरह फ्लॉप हो गई। जीतेंद्र को 2.5 करोड़ का नुकसान हुआ और वो कंगाल हो गए। इस नुकसान से उभरने के लिए जीतेंद्र ने बैक-टू-बैक 60 फिल्में कीं, जिनमें से ज्यादातर रीमेक थीं। 2002 से लेकर 2012 तक जीतेंद्र को 5 बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। जीतेंद्र का 22 फिल्मों में नाम विजय रखा गया है और 26 फिल्मों में रवि। रवि, जीतेंद्र का असली नाम भी है। 2014 में जीतेंद्र को दादा साहेब फाल्के लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।

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