लद्दाख के एलजी वीके सक्सेना ने बुधवार को लेह में ‘रॉक चेक डैम’ का उद्घाटन किया। यह सिंधु नदी पर बनाया गया है। इसे “सिंधु जल समृद्धि अभियान” के तहत बनाया गया है। इससे लद्दाख में पानी की कमी दूर होगी और किसानों को खेतों को भी पानी मिलेगा।
एलजी वीके सक्सेना ने बताई डैम की खासियत
उद्घाटन के बाद एलजी सक्सेना ने कहा कि इस रॉक चेक डैम को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह पानी के दबाव को झेल सके और गर्मियों के महीनों में जब नदी में जल स्तर बढ़ता है तो यह बह न जाए। मैंने सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग को प्रायोगिक आधार पर ऐसे तीन और चेक डैम बनाने का निर्देश दिया है।
मुझे विश्वास है कि यह रॉक चेक डैम इंजीनियरिंग की कुशलता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में उभरेगा। यह किसानों की सिंचाई संबंधी समस्याओं का एक टिकाऊ समाधान प्रदान करेगा, जल सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा और लद्दाख के दूरदराज के गांवों में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देगा।
‘रॉक चेक डैम’ का उद्घाटन
किसानों को भी मिलेगी फायदा
एक्स हैंडल पर एलजी ने बताया कि पारंपरिक कंक्रीट चेक डैम के विपरीत यह नया रॉक चेक डैम एक अर्ध-स्थायी अवरोधक है, जिसे नदी तल से इकट्ठा किए गए बड़े-बड़े पत्थरों को आपस में फंसाकर बनाया गया है। यह नदी के बहाव को धीमा कर देता है और पानी जमा होने के लिए एक विशाल क्षेत्र (तालाब) बनाता है, जिसका उपयोग किसान कृषि कार्यों के लिए कर सकते हैं।
पानी की एक पुरानी चुनौती से निपटना
लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना की सोच से शुरू हुई यह परियोजना इस क्षेत्र की एक पुरानी चुनौती को हल करना चाहती है। ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों के बावजूद, कई गांव बुवाई के अहम मौसम में पानी नहीं पा पाते, क्योंकि पारंपरिक पंपिंग सिस्टम काम नहीं कर पाते।
पायलट प्रोजेक्ट को शुरुआती सफलता मिली
लेह से लगभग 45 किलोमीटर दूर के-थांग उपशी में पूरा हुआ यह पायलट प्रोजेक्ट पहले ही उम्मीद जगाने वाले नतीजे दिखा चुका है। 12 मई से 18 मई के बीच बनाया गया, 200 फुट लंबा यह पत्थरों का चेक डैम, स्थानीय रूप से उपलब्ध विशाल पत्थरों का इस्तेमाल करके बनाया गया था, जिनका वज़न 500 किलोग्राम से लेकर 10 मीट्रिक टन तक था। इस ढांचे को बनाने के लिए नदी के तल पर रणनीतिक रूप से लगभग 180 मीट्रिक टन पत्थर रखे गए थे, जिसकी अनुमानित लागत सिर्फ़ 10 लाख रुपये थी।
कम लागत वाला इंजीनियरिंग समाधान
पारंपरिक सीमेंट-कंक्रीट की रुकावटों के विपरीत, पत्थरों से बना यह छिद्रपूर्ण चेक डैम पानी के बहाव को धीमा कर देता है, जबकि उसे स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने भी देता है। इससे नदी के ऊपरी हिस्से में पानी जमा होने का एक बड़ा क्षेत्र बन जाता है, जिससे नदी की गहराई काफ़ी बढ़ जाती है और सिंचाई के लिए पानी निकालना संभव हो जाता है।
अधिकारियों ने बताया कि इस पायलट डैम ने नदी के ऊपरी हिस्से में लगभग 500 मीटर तक पानी जमा करने का एक क्षेत्र बना दिया है, जिसमें अनुमानित 40 मिलियन लीटर पानी जमा है। किनारों के पास पानी की गहराई बढ़कर 4-5 फुट हो गई है, जबकि बीच के हिस्से में अब यह लगभग 10 फुट तक पहुंच गई है।
प्रशासन ने इस ढांचे को नदी के बहाव में होने वाले मौसमी उतार-चढ़ाव को झेलने के हिसाब से डिज़ाइन किया है। मई में नदी का बहाव लगभग 25 क्यूसेक होता है, जो जुलाई और अगस्त के भीषण गर्मी वाले महीनों में बढ़कर लगभग 200 क्यूसेक तक पहुंच जाता है।
हिमालयी नदियों के लिए पर्यावरण-अनुकूल मॉडल
सिंचाई के अलावा, इस पहल को पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ भी माना जा रहा है। चूंकि ये बांध पूरी तरह से नदी के तल में पाए जाने वाले स्थानीय पत्थरों से बनाए जाते हैं, इसलिए ये कंक्रीट या ऐसे पदार्थों का इस्तेमाल किए बिना, जो आसानी से नष्ट नहीं होते (non-biodegradable), हिमालयी नदी प्रणाली की नाज़ुक पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखते हैं।








































