Coffee Par Kurukshetra: इंडिया टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम “कॉफी पर कुरुक्षेत्र” में आज गुरुवार को समाजवादी पार्टी में संभावित टूट को लेकर चर्चा हुई। हाल के दिनों में लगातार ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें दावा किया जा रहा है कि सपा के कई सांसद पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं। कार्यक्रम में मेहमानों ने अपने-अपने राजनीतिक आकलन साझा किए। चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर के साथ मेहमान के तौर पर आलोक मेहता और मनोज कुमार सिंह मौजूद रहे।
चर्चा में महाराष्ट्र की राजनीति का भी जिक्र हुआ, जहां उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों के एकनाथ शिंदे खेमे के साथ जाने की अटकलों को बल मिला। बताया गया कि उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई बैठक में कोई सांसद नहीं पहुंचा। साथ ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा संबंधित सांसदों को वाई प्लस सुरक्षा दिए जाने को भी एक महत्वपूर्ण संकेत माना गया।
सपा में टूट की अटकलों पर चर्चा
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बात करते हुए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के उस बयान का उल्लेख किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि समाजवादी पार्टी के 25-26 सांसद भाजपा में आने को तैयार हैं, लेकिन भाजपा उन्हें शामिल नहीं कर रही है। राजनीतिक संपादक देवेंद्र पराशर ने दावा किया कि लोकसभा चुनाव 2024 के बाद सपा के कुछ सांसदों ने भाजपा नेतृत्व तक संदेश पहुंचाया था कि यदि पार्टी इच्छुक हो तो वे भाजपा में आने के लिए तैयार हैं। हालांकि, शीर्ष नेतृत्व ने उस समय इस प्रस्ताव को महत्व नहीं दिया।
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों पर भी हुई बात
इस बीच, झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने भी विपक्षी एकता पर नए सवाल खड़े कर दिए। राज्यसभा की दो सीटों पर हुए चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) का उम्मीदवार और निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी विजयी रहे, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा हार गए। चर्चा में शामिल वक्ताओं ने कहा कि संख्या बल कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन के पक्ष में होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार की हार यह संकेत देती है कि गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी है।
विश्लेषकों ने दावा किया कि जेएमएम ने अपने उम्मीदवार को अपेक्षा से अधिक वोट दिलवाए, जबकि कुछ वोट अमान्य भी हो गए। इस घटनाक्रम को कांग्रेस और जेएमएम के रिश्तों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया। चर्चा में यह भी कहा गया कि कांग्रेस द्वारा स्थानीय उम्मीदवार की बजाय बाहरी उम्मीदवार को मैदान में उतारना सहयोगी दलों की नाराजगी का कारण बना।
विपक्षी गठबंधन और राजनीतिक समीकरणों पर नजर
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना था कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और अब झारखंड की घटनाएं विपक्षी दलों के भीतर बढ़ती असहजता को दर्शाती हैं। यह भी दावा किया कि क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए राष्ट्रीय गठबंधन से अधिक अपने हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर चर्चा
चर्चा के दौरान महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संभावित विधेयकों का भी जिक्र हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि केंद्र सरकार इन मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए संसद के दोनों सदनों में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यह भी कहा गया कि यदि आवश्यक संख्या बल सुनिश्चित हो जाता है तो इन विषयों पर विशेष सत्र बुलाकर आगे की प्रक्रिया की जा सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जब किसी पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर विश्वास कमजोर होता है, तब टूट की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। उन्होंने दावा किया कि केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं, बल्कि अन्य विपक्षी दलों में भी असंतोष की स्थिति दिखाई दे रही है।
हालांकि, चर्चा में यह भी स्वीकार किया गया कि अभी तक समाजवादी पार्टी में किसी प्रकार की औपचारिक टूट नहीं हुई है। बावजूद इसके, लगातार आ रहे बयानों और राजनीतिक गतिविधियों ने अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। आने वाले दिनों में मानसून सत्र और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम यह तय करेंगे कि ये चर्चाएं केवल राजनीतिक बयानबाजी हैं या फिर किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार हो रही है।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)







































