देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में इन दिनों अंदरूनी खींचतान चर्चा का विषय बनी हुई है। एक तरफ पंजाब कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की नाराजगी लगातार सुर्खियां बटोर रही है, तो दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में बीजेपी नेता नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने के बाद उनके समर्थकों का विरोध प्रदर्शन भी काफी चर्चा में रहा। दोनों घटनाएं एक जैसी जरूर दिखती हैं, लेकिन दोनों पार्टियों की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग नजर आई। इसी विषय पर ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में हुई चर्चा में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
BJP में विरोध के बाद संगठन के साथ खड़े दिखे नरोत्तम मिश्रा
नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने के बाद उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया। हाईवे जाम हुए, हंगामा हुआ और पार्टी कार्यालय तक पर कब्जा करने की कोशिश हुई। हालांकि कुछ ही समय बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। नरोत्तम मिश्रा पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के साथ मंच पर दिखाई दिए और उन्होंने घर-घर जाकर प्रचार करने की बात कही। इससे साफ संदेश गया कि बीजेपी में अंतिम फैसला संगठन का होता है और नेताओं को उसी के साथ चलना पड़ता है।
कांग्रेस में चन्नी की नाराजगी बनी हाईकमान की चुनौती
दूसरी ओर पंजाब कांग्रेस में चरणजीत सिंह चन्नी लगातार अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। उनकी ओर से प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग को हटाने की मांग भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। पार्टी के कई नेताओं का समर्थन भी चन्नी को मिलता दिखाई दे रहा है। ऐसे में राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के सामने यह चुनौती है कि वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं या कोई समझौते का रास्ता निकालते हैं।
बीजेपी और कांग्रेस की कार्यशैली में सबसे बड़ा अंतर
चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि बीजेपी एक कैडर आधारित पार्टी है, जहां संगठन की ताकत व्यक्तिगत नेताओं से ऊपर मानी जाती है। वहीं कांग्रेस में कई नेताओं का अपना अलग जनाधार होने की वजह से असहमति खुलकर सामने आती है। यही वजह है कि दोनों पार्टियों में बगावत का तरीका और उसका असर भी अलग-अलग दिखाई देता है।
क्या कांग्रेस का हाईकमान पहले जितना प्रभावशाली नहीं रहा?
कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि पहले कांग्रेस नेतृत्व नाराज नेताओं को बातचीत और संगठनात्मक ताकत के दम पर आसानी से संभाल लेता था। लेकिन मौजूदा हालात में राहुल गांधी के सामने वही चुनौती कहीं ज्यादा कठिन नजर आती है। अगर पार्टी अपने फैसले से पीछे हटती है तो इसका सीधा असर नेतृत्व की साख पर पड़ सकता है।
बीजेपी ने दिया अनुशासन का संदेश
वक्ताओं का मानना रहा कि बीजेपी में दबाव की राजनीति ज्यादा देर तक नहीं चलती। संगठन का फैसला अंतिम माना जाता है और जो भी नेता उस सीमा को पार करता है, उसे अनुशासन का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से नरोत्तम मिश्रा का विरोध अंततः संगठन के समर्थन में बदलता दिखाई दिया।
आने वाले समय में किसकी परीक्षा ज्यादा कठिन?
दोनों घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसका नेतृत्व और संगठन होता है। बीजेपी ने इस पूरे घटनाक्रम में अनुशासन का संदेश देने की कोशिश की, जबकि कांग्रेस के सामने अब भी पंजाब का विवाद बड़ी चुनौती बना हुआ है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि राहुल गांधी इस संकट को कैसे संभालते हैं और क्या कांग्रेस इस बगावत को शांत कर पाती है।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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