नई दिल्ली: इंडिया टीवी के लोकप्रिय शो “कॉफी पर कुरुक्षेत्र” में बुधवार (3 जून) को इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि तृणमूल कांग्रेस के अंदर मची कलह के सामने आने के बाद ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी निकल गई है। चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर के साथ मेहमान के रूप में प्रदीप सिंह और आलोक मेहता मौजूद रहे।
ममता के हाथ से सरक गई तृणमूल कांग्रेस पार्टी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर शुरू हुआ विवाद अब बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। विधानसभा चुनाव में हार के ठीक एक महीने बाद पार्टी के भीतर बगावत खुलकर सामने आ गई है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने दावा किया है कि उनके साथ दो-तिहाई से अधिक विधायक हैं और विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) के रूप में मान्यता भी दे दी है।
इंडिया टीवी के कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस घटनाक्रम को TMC के इतिहास का सबसे बड़ा संकट बताया। चर्चा में कहा गया कि यह केवल पार्टी में टूट नहीं है, बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पार्टी का विधायी नियंत्रण ही ममता बनर्जी के हाथों से निकल गया है।
ऋतब्रत गुट का दावा- हमारे साथ बहुमत
ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि TMC के 80 विधायकों में से 60 से अधिक विधायक उनके साथ हैं। उनका कहना है कि सभी संवैधानिक और विधायी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए विधानसभा में उनके समूह को मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता मिली है। उन्होंने कहा कि उनका गुट “मैं” नहीं बल्कि “हम” की राजनीति में विश्वास करता है।
हालांकि, उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि वे उन्हें पार्टी की “मुख्य सलाहकार” के रूप में देखना चाहते हैं और उनके अनुभव का लाभ लेना चाहते हैं।
अभिषेक बनर्जी पर लगातार हमले
ऋतब्रत बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उनका जनता और पार्टी से जुड़ाव कमजोर पड़ चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि संकट के समय अभिषेक जनता के बीच नहीं दिखाई दिए और बाद में अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा नाराजगी अभिषेक बनर्जी को लेकर दिखाई दे रही है। चर्चा में यह भी कहा गया कि कई सांसद और विधायक निजी बातचीत में उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
टीएमसी की कानूनी दलील और नया विवाद
TMC नेतृत्व का कहना है कि ऋतब्रत बनर्जी को पहले ही पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है, इसलिए वे पार्टी या विधायक दल का नेतृत्व नहीं कर सकते। लेकिन राजनीतिक जानकारों का तर्क है कि केवल निष्कासन से विधानसभा सदस्यता समाप्त नहीं होती और यदि बहुमत विधायक किसी नेता का समर्थन करते हैं तो स्थिति अलग हो सकती है।
चर्चा में फर्जी हस्ताक्षर वाले पत्र का मुद्दा भी उठा। आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष और पार्टी पदों को लेकर स्पीकर को भेजे गए एक पत्र में कुछ विधायकों के हस्ताक्षर विवादित पाए गए। इस मामले की जांच सीआईडी कर रही है। ऋतब्रत गुट का कहना है कि यदि जांच में फर्जीवाड़ा साबित होता है तो मामला और गंभीर हो सकता है।
संगठन भंग करने का फैसला भी चर्चा में
राजनीतिक हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि TMC ने पश्चिम बंगाल में अपनी विभिन्न समितियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग करने का फैसला किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संगठन पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश हो सकती है, लेकिन इससे पार्टी के भीतर संकट और गहरा सकता है।
बीजेपी ने साधा निशाना
भाजपा नेताओं ने पूरे घटनाक्रम को TMC की अंदरूनी विफलता बताया है। उनका आरोप है कि सत्ता में रहते हुए पार्टी भ्रष्टाचार और घोटालों में उलझी रही, जिसका नतीजा चुनावी हार और अब संगठनात्मक टूट के रूप में सामने आया है।
अदालत और चुनाव आयोग पर टिकी नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मामला अदालत और चुनाव आयोग तक पहुंच सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि असली TMC किसे माना जाए। यदि विधायक और सांसदों का बहुमत ऋतब्रत गुट के साथ बना रहता है तो पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी नई कानूनी लड़ाई शुरू हो सकती है।
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC का यह संकट सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है और सभी की नजरें ममता बनर्जी के अगले कदम पर टिकी हैं।
डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिये गये वीडियो पर क्लिक करें।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)









































