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EXCLUSIVE: 1971 की तोपों वाली जंग और आज के हाई‑टेक वॉरफेयर में कितना है अंतर? विजय दिवस पर पढ़ें BSF के पूर्व DIG से खास बातचीत

by krutikadalvibiz
December 16, 2025
in Blog, Lifestyle
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EXCLUSIVE: 1971 की तोपों वाली जंग और आज के हाई‑टेक वॉरफेयर में कितना है अंतर? विजय दिवस पर पढ़ें BSF के पूर्व DIG से खास बातचीत
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1971 war vs operation sindoor- India TV Hindi
Image Source : AP
1971 से अब तक भारतीय सेना की चुनौतियों की कहानी।

Vijay Diwas Celebration: विजय दिवस के मौके पर जब देश 1971 की जंग की ऐतिहासिक विजयगाथा को याद कर रहा है, तब INDIA TV ने BSF के पूर्व DIG नरेंद्र नाथ धर दुबे से खास बातचीत की। इस Exclusive इंटरव्यू में उन्होंने 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग में भारतीय फौज की निर्णायक फतह के मायने बताए, साथ ही 54 साल पहले की जमीनी लड़ाई से लेकर आज के हाई-टेक वॉरफेयर तक इंडियन आर्मी के सफर पर रोशनी डाली। उन्होंने यह भी समझाया कि 2040 के भारत के सामने सीमा सुरक्षा, साइबर वॉर और ड्रोन युद्ध में से सबसे बड़ी सैन्य चुनौती क्या होगी? जानें इन मुद्दों पर BSF के पूर्व DIG ने क्या बताया।

सवाल- 1971 का पाकिस्तान से युद्ध, भारतीय सेना की बड़ी जीत थी, उस दौर की सेना से आज की आर्मी तक के सफर को आप कैसे देखते हैं? तब से अब तक कौन-सी चीजें सबसे ज्यादा बदली हैं?

जवाब- नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि 1971, भारत के युद्ध के इतिहास का इकलौता निर्णायक युद्ध था। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के 1947 में इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन साइन करने के बाद, भारतीय सेना को पहली बार शौर्य दिखाने का मौका तब मिला था जब पाकिस्तान के कबाइली ने जम्मू-कश्मीर की रियासत पर हमला किया। उसे पाकिस्तान की फौज का समर्थन मिला हुआ था। उस वक्त इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के जरिए भारत को इस बात का अधिकार मिला कि वह मिलिट्री भेजकर हस्तक्षेप करे। और 1947 में बहुत कम समय में भारत ने जम्मू-कश्मीर में दखल दिया, लेकिन यह काम होते-होते जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा टूटकर पीओके बन गया। लेकिन आप ये न भूलें कि पाकिस्तान बनने की जो बुनियाद है, ये बहुत ही पुरानी है, और उस बुनियाद की निरंतरता आज भी वही है, बस उसका रूप बदल गया है।

1965 में पाकिस्तान ने फिर दुस्साहस करने की कोशिश की, और 1965 में वेस्टर्न फ्रंट पर और ईस्टर्न फ्रंट पर पाकिस्तान को दोबारा भारत के हाथों शिकस्त मिली। लेकिन 1971 का जो वॉर था, ये बड़ा ही निर्णायक था। यह एकतरफा जंग थी। दुनिया के युद्ध के इतिहास में इसकी मिसाल दी जाती है। 1971 में तो हम बच्चे हुआ करते थे, उस युद्ध की कवरेज ट्रांजिस्टर पर सुनने का मुझे कुछ-कुछ याद है। लेकिन आप सोचिए कि 4090 किलोमीटर ईस्ट पाकिस्तान के बॉर्डर पर किस तरह से उस समय की लीडरशिप ने तैयारी करके इसी जाड़े के महीने में खुला युद्ध लड़ा। फिर पूर्वी पाकिस्तान को मुख्य पाकिस्तान से अलग कर दिया।

इसके इतिहास में ये भी है कि सीमा सुरक्षा बल जो 1965 में रेंज किया गया था, वो 25 मार्च 1971 को ही बांग्लादेश के अंदर यानी अर्स्टव्हाइल ईस्ट पाकिस्तान के अंदर दाखिल हो चुका था, और इसकी मिलिट्री ब्रीफिंग, बीएसएफ अकादमी टेकनपुर में हुई थी, जिसमें मिलिट्री कमांडर, हमारे चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ सैम बहादुर मानेकशॉ साहब खुद मौजूद थे। और वह दिन था जब बीएसएफ ने 1971 में पहली बार होममेड रॉकेट्री को यूज किया था, और बीएसएफ का जो कॉलम था ईस्ट पाकिस्तान में, वो आर्मी के ओपन कॉलम का हिस्सा बना, और राजशाही कैंटोनमेंट पर जो पहला बमबार्डमेंट हुआ, वो पद्मा नदी के थ्रू बोट के जरिए जाकर आर्मी और बीएसएफ के ट्रूप्स ने राजशाही कैंटोनमेंट में किया। वो पहली शेलिंग थी, वो इतिहास का पार्ट है।

उसके अलावा नॉर्थ ईस्ट के और बंगाल बॉर्डर के बहुत सारे ऐसे इलाके हैं, जिसमें ओपन वॉर हुआ और उस वॉर की हिस्ट्री है। लेकिन वह जो वॉर था ना, वो हॉविट्जर और 303 गन से लड़ा गया था। यानी हमारे पास तोप के नाम पर हॉविट्जर होती थी। और 303 बोल्ट एक्शन गन होती थी एनफील्ड कंपनी की, जिसमें वह कंपनी भी विदेशी कंपनी थी, तब हम 303 गन भी खुद प्रोड्यूस नहीं करते थे। आप सोच सकते हैं कि कितने बुनियादी हथियारों से भारतीय सेना, सीमा सुरक्षा बल, वायु सेना का सपोर्ट, कितने बुनियादी हथियारों से वह लड़ाई हुई थी। और नौसेना ने तो एक साइलेंट फाइटर के तौर पर, उन्होंने जो अरेबियन सी और बे ऑफ बंगाल में जो डोमिनेंस कायम रखा, उस डोमिनेंस से तो पाकिस्तान हिल गया था।

अब उस लड़ाई को देखिए कि वो एक शौर्य की लड़ाई थी, वो ये संख्या बल की लड़ाई थी, हिम्मत की लड़ाई थी, नंबर ऑफ बूट्स की लड़ाई थी कि ग्राउंड पर कितने बूट्स हैं। और स्ट्रैटेजिकली भारत का बहुत बड़ा एडवांटेज था कि लैंड लॉक्ड तीन साइड से भारत था ईस्ट पाकिस्तान के तीन तरफ से, और नीचे बे ऑफ बंगाल था, जहां हमारी नेवी की सुप्रीमेसी थी। तो कुल मिलाकर के वो एक डिसिसेव वॉर रहा, और उस वॉर में सैन्य शक्ति का जो एक बड़ा कन्वेंशन बेसिक रूडिमेंट्री प्रदर्शन था। उसमें तोप के नाम पर होविट्जर्स और राइफल के नाम पर बोल्ट एक्शन सिंगल 303 राइफल्स थी। लेकिन 1971 से अगर वह यात्रा आप शुरू करें, तो इन 54 सालों में मिलिट्री हिस्ट्री और जो हमारा डिफेंस डॉक्ट्रिन है और डिफेंस प्रिपेयर्डनेस है यह मेनीफोल्ड बहुत आगे बढ़ चुका है।

यह इतना आगे बढ़ चुका है कि ऑपरेशन सिंदूर 2025 में आपने इसका मुजायरा देखा, जिसमें 32 मिनट के विंडो में भारतीय सेना एयरफोर्स ने पाकिस्तान के 14 ठिकानों को तबाह किया, जिसमें नूर खान एयर बेस, किराना हिल्स, रावलपिंडी उसके बाद अगर टॉप पर जाइए तो पीओके के कुछ हिस्से जिसमें अगर आप देखें तो भारत का हिस्सा जो स्कार्दू का है, स्कार्डू से लेकर और बोलारी यानी कराची के ईस्ट पार्ट तक कोई भी एयरबेस नहीं बचा, जहां भारतीय वायुसेना ने अपना शौर्य ना दिखाया हो। और उनके एयरबेसेस को इस तरह से न्यूट्रलाइज किया, इस तरह से अनफिट फॉर यूज किया कि पाकिस्तान उसका रिस्पांस दे ही नहीं सका।

सबसे बड़ी बात तो यह रही कि उनका एक न्यूक्लियर ब्लैकमेल का जो पर्दा था वह पूरी दुनिया के सामने आ गया कि एक बंदर घुड़की देना कि हम तो न्यूक्लियर बम का इस्तेमाल करेंगे। न्यूक्लियर बम तो एक ही बार अमेरिका ने किया था हिरोशिमा और नागासाकी पर, उसके बाद दुनिया में न्यूक्लियर बम छूटा नहीं, क्योंकि न्यूक्लियर बम की लड़ाई में जीतता कोई नहीं है। खाली मानवता हारती है, इंसान या देश उसको जीतता नहीं है।

तो देखा जाए तो भारत की ये यात्रा 1971 से 2025 तक बड़ी सिग्निफिकेंट यात्रा रही। इसके पीछे बड़े कारण रहे। कारण यह रहे कि पहले हम लोग डेवलप्ड कंट्रीज के डिफेंस इक्विपमेंट पर पूरा भरोसा करते थे। लेकिन बीच-बीच में कहते हैं ना कि जो झटका लगता है तो झटका आपको मजबूत बनाता है। जब आपके न्यूक्लियर पावर बनने या न्यूक्लियर प्रिपरेशन की बात आई तो वर्ल्ड कम्युनिटी ने आपके साथ किस तरह का बर्ताव किया। नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी तक की बात आई और उससे जुड़ी हुई टेक्नोलॉजी भी देने के लिए लोगों ने मना कर दिया। मैं तो शुक्रगुजार हूं उन वैज्ञानिकों का डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा, उसके बाद सतीश धवन, विक्रम सारा भाई, डॉ. एपीजे कलाम और ना जाने ऐसे कितने वैज्ञानिक जिन्होंने इसरो की कल्पना की जिन्होंने डीआरडीओ की कल्पना की अगर इसरो ना होता डीआरडीओ ना होता तो हमारे सैटेलाइट इस समय आकाश में नहीं होते।

हमारे पास मिसाइल नहीं होती। जिस अग्नि मिसाइल की हम आज बात करते हैं इसकी संकल्पना 1981-82 में की गई थी यानी एक इतना इफेक्टिव आर्मामेंट डेवलप होने में भी 45 वर्ष लगे। तो भारत ने वहां से यात्रा शुरू की और अपने देश को, अपने देश की व्यवस्था में उन्होंने एक डिफेंस प्रिपेयर्डनेस का एक बहुत बड़ा खाका खींचा क्योंकि दुनिया इस समय देखिए अगर आज भी हम देखें तो भारत और पाकिस्तान के बीच जो अप्रैल में एक कॉन्फ्लिट हुआ। इस संघर्ष में भी दुनिया में हमको नसीहत देने वाले ज्यादा मिले हमको शांति का ज्ञान देने वाले बहुत मिले।

यूरोपियन कंट्रीज जो कि वेस्टर्नाइज्ड हैं लेकिन थोड़ा न्यूट्रल मानी जाती हैं, उन्होंने भी इस हमले की निंदा तो की। लेकिन पाकिस्तान को करारा जवाब दीजिए, यह किसी के मुंह से नहीं निकला। हमारी धरती पर चाइनीस फाइटर एयरक्राफ्ट मिसाइल और ड्रोन्स चाइना के बने हुए पाकिस्तान ने यूज़ किए। टर्की का मटेरियल यूज हुआ। अजरबैजान का मटेरियल यूज हुआ। लेकिन कितना विश्व कॉम्प्लेक्स है आज की तारीख में, आज लड़ाई सिर्फ सामरिक लड़ाई नहीं है। यह पूरी लड़ाई इकोनॉमिकल वॉर में चेंज हो चुकी है, ये ट्रेड वॉर फेयर है।

ट्रेड वॉर फेयर, सिक्योरिटी या मिलिट्री वॉर फेयर के साथ इतना ज्यादा मिक्स हो चुका है कि जिस चाइना के हथियार हमारे खिलाफ यूज हुए, उस चाइना से हम 105 बिलियन डॉलर का आज की तारीख में बिजनेस करते हैं। कोई रास्ता नहीं है, आपको करना है। क्योंकि वर्ल्ड मार्केट में अमेरिका आपको ओपन टैरिफ का धमकी दे रहा है और आपके ऊपर टैरिफ लगा रहा है। आपको पता है कि अमेरिका से हमारा एक्सपोर्ट ज्यादा है इंपोर्ट कम है। तो अमेरिका ने इसको टाइट करने के लिए हमारे ऊपर इतने भयंकर टैरिफ लगाए।

यह वह लोग हैं जो कि यूनाइटेड नेशन लेकर आए सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद, डब्ल्यूटीओ अमेरिका लेकर के आया, इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड अमेरिका लेकर आया और वर्ल्ड बैंक भी अमेरिका लेकर आया, सिर्फ अपने प्रोडक्ट को दुनिया में बेचने के लिए, वह भी उन शर्तों पर जो शर्त उनके इकॉनमी को सपोर्ट करती है। तो ऐसे कॉम्प्लेक्स वर्ल्ड में भारत अलग-थलग तो नहीं पड़ सकता।

भारत ने अपनी डिफेंस कैपेबिलिटी बढ़ाई और इस समय हम उस जगह पर खड़े हैं कि अभी आपने देखा होगा हाल ही में रशियन प्रेसिडेंट व्लादिमीर पुतिन 2 दिन के विजिट के बाद वापस रशिया लौटे। यह बहुत अच्छा लगा सुनकर कि 2030 तक भारत 100 बिलियन डॉलर का ट्रांजेक्शन रशिया के साथ करने जा रहा है। ट्रेडिशनल वॉर आप देखिए जो हमने लड़ाई चाहे 71 की लड़ी या आज के 2025 में भी हम खड़े हैं। हमारा सबसे बड़ा डिफेंस सप्लायर रशिया रहा है और इसमें भी बड़ी खुशी की बात है, पांच स्क्वाड्रन S-400 का भी उन्होंने समझौता करने की बात की है जो हमारे एयर डिफेंस का बहुत बड़ा एक शील्ड है जिसको सुदर्शन चक्र कहते हैं।

इस समझौते के बाद 5 स्क्वाड्रन, इंडिया अभी खड़ा करने जा रहा है। इसके बाद इतनी सीरीज ऑफ डील हुई हैं और अब क्वेश्चन ये नहीं है कि बायर और सेलर, रशिया बेचे हम खरीदें। नाउ द रिलेशनशिप बेटवीन इंडिया एंड रशिया इज नॉट बायर एंड सेलर। ये रिलेशनशिप अब पहुंच गई है पार्टनरशिप की। क्योंकि ब्रह्मोस को हमने पार्टनरशिप में तैयार किया था। और वो ब्रह्मोस इतना कामयाब साबित हुआ कि अमेरिकन की पाकिस्तानी डिफेंस के परखच्चे उड़ गए। पाकिस्तान इस पोजीशन में नहीं रहा कि उसे डिफेंड कर सके।

अब इस बार जो समझौता होने जा रहा है ब्रह्मोस का हम वह मॉडल डेवलप करने जा रहे हैं जो लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट से भी हम ड्रॉप कर सकें। क्योंकि ब्रह्मोस का अभी जो प्रोजेक्टाइल है, उसके लिए हमें बड़े-बड़े जेट इंजन की जरूरत होती है। तभी हम छोटे जेट इंजन के हिसाब से भी उसको प्रोड्यूस करने जा रहे हैं और वर्ल्ड के थर्ड वर्ल्ड कंट्री के हम सप्लायर बनने जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि हम सप्लायर बनने जा रहे हैं। और 49 लाख करोड़ तो डिफेंस बजट में आपके आरएनडी पर, रिसर्च पर और प्रोडक्शन के लिए गवर्नमेंट ने एलोकेट किए हैं। तो देखा जाए कि हमारा डिफेंस बजट भी करीब 13-14 प्रतिशत बढ़ा है। तो भारत अभी आज की तारीख में डिफेंस खाली हम अपनी सुरक्षा के लिए नहीं, डिफेंस कॉमर्स के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत सिर्फ आत्मरक्षा के लिए हथियार नहीं बना रहा है। भारत यह हथियार दुनिया को बेचेगा क्योंकि 37 करोड़ युवा हमारे देश में हैं। 60 करोड़ जो मिडिल एज के लोग इस कंट्री में हैं और भारत 145 करोड़ का देश है जो वर्ल्ड का सबसे बड़ा कंज्यूमर मार्केट है। क्योंकि अमेरिका की ताकत है सर्विस सेक्टर। अमेरिका का पैसा सबसे ज्यादा सर्विस सेक्टर में है। चाइना की सबसे बड़ी ताकत है मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर। वर्ल्ड का करीब 22 प्रतिशत प्रोडक्शन चाइना कर रहा है आज की तारीख में। तो चाइना पिछले 20-22 साल में अपने आपको ऑलमोस्ट 20 ट्रिलियन इकॉनमी पर ले गया।

तो 20 ट्रिलियन इकॉनमी और भारत 4.2 ट्रिलियन इकॉनमी। अभी चाइना और हमारे बीच बहुत गैप है। हमें इस गैप को ही भरना है। तो डिफेंस के क्षेत्र में हम 1971 में कहां खड़े थे, आज कहां खड़े हैं, अभी पिछले 10 साल के अंदर 2014 से 24 के अंदर 10 टाइम्स ग्रोथ हुई है हमारी। यानी पिछले 10 साल के अंदर की बात बता रहा हूं मैं। भारत अब ये समझ गया है कि वर्ल्ड में कंपीट करने के दो ही मूल मंत्र हैं- स्वदेशी और स्वावलंबी। यानी वी हैव टू बी सेल्फ-रिलायंट, वी हैव टू बी आत्मनिर्भर।

आज की तारीख में वॉरफेयर तो सिर्फ बॉर्डर पर राइफल से लड़ा नहीं जा रहा। आज की तारीख में तो टीवी के स्क्रीन भी वॉरफेयर का बहुत बड़ा हिस्सा है। कंप्यूटर स्क्रीन पर भी लड़ाई लड़ी जा रही है। यानी आप एक टाइम था कि पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से तोड़कर अलग बांग्लादेश बनाने के लिए हमारे जवानों ने टोटली रिवेराइन ईस्ट पाकिस्तान एरिया में पैदल चल-चलकर उस देश के ऊपर कब्जा किया। लेकिन आज की तारीख में 260 किलोमीटर आपकी मिसाइल बिना बॉर्डर क्रॉस किए मारकर आ गई है। ये देख लिया आपने अपने सामने कि नन ऑफ द सोल्जर क्रॉस दी इंटरनेशनल बॉर्डर ड्यूरिंग ऑपरेशन सिंदूर।

सारी लड़ाई अपने ही भूभाग में रहकर और एक टेक्नोलॉजिकल लड़ाई लड़ी गई है। जिसके अंदर स्पेस वॉरफेयर, आपके सैटेलाइट का बहुत बड़ा रोल है। आपके नेविगेशनल इक्विपमेंट्स जो आपने छोड़े हुए हैं आकाश में, उसका कितना बड़ा रोल है। और उसके बाद सिनर्जाइजिंग योर इंडिजनस प्रोडक्ट विद दीस हाई एंड इक्विपमेंट यानी जितनी पुरानी धरोहर थी उनको हम लोगों ने नई टेक्नोलॉजी से सिंक्रोनाइज किया है। जिस वजह से इतना एक्यूरेट, इतना पिनपॉइंट और इतने कम टाइम में वह सक्सेस मिला है जिसको पूरी दुनिया देख रही है।

और आज भारत सबकी आंख का कांटा है। क्योंकि वर्ल्ड मार्केट में अगर कंपटीशन कोई करेगा तो सिर्फ भारत करेगा। और अमेरिका हो, चाइना हो, यूरोपियन यूनियन हो, यह कोई भी नहीं चाहता कि उनके डिफेंस प्रोडक्शन का इंडिया कंपटीटर बने आने वाले टाइम में। तो यह एक बहुत बड़ा एक चेंज है और 71 से 25 की बड़ी ही इंटरेस्टिंग जर्नी है।

सवाल- जैसा कि आपने बताया कि 1971 की वॉर हमने हॉविट्जर तोपों और 3 नॉट 3 की राइफल से लड़ी। तो मैं आपसे जानना चाहता हूं कि जब हम 2025 में आ गए हैं, तो सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव तब से लेकर अब तक आप किसे मानते हैं?

जवाब- BSF के पूर्व DIG ने बताया कि हमारा सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन यह है कि हमारे बदलाव, हमारे काउंटर पार्ट कंट्री के रिस्पॉन्स से बहुत ज्यादा कनेक्टेड हैं। आज का बदलाव यह है कि आपके पास ऐसी सामरिक टेक्नोलॉजी होनी चाहिए जो बिना बिना वॉर को ओपन किए और वॉर लड़ ले। जिसको कहते हैं ना कि वॉर शुरू होने से पहले वॉर जीत लेना। यह बहुत बड़ी बात है। तो एक तो साइबर वर्ल्ड अभी इस समय सबसे ज्यादा टॉप पर है। यानी साइबर वर्ल्ड में साइबर अटैक भी आता है। साइबर का इस्तेमाल अपोनेंट कंट्री को डाउन करने के लिए और एयर डिफेंस सिस्टम को टोटली पैरालाइज करने के लिए होता है।

अमेरिकन एयर डिफेंस सिस्टम 9-10 मई की रात को टोटली डिसरप्टेड था। उनका कोई डिफेंस सिस्टम इंडिया के अग्रेसिव फाइटर या इंडिया के अग्रेसिव मिसाइल को ट्रैक करने के हालत में नहीं था। इसीलिए वह अपने एसेट्स बचा नहीं पाए। इट वाज ऑलमोस्ट अनस्पोकन सरेंडर। तो जो आपकी एडी, आपका जो एयर डिफेंस सिस्टम है जिसको शील्ड कहते हैं आप, उससे दुश्मन के किए गए हमले से खुद को बचाना और जो लॉयटरिंग ड्रोन का उन्होंने इस्तेमाल किया, वह भी एक बहुत बड़ा बहुत बड़ा एक चैलेंज था हमारे लिए। उससे हमारी सिविलियन आबादी की कैजुअल्टी का बहुत बड़ा खतरा था। उससे भी हमारी एडी ने बचाया।

और उसमें बहुत सारे कंपोनेंट थे। अकेले खाली एस-400 ही नहीं था। हमारे और भी बहुत सारे इक्विपमेंट थे। आकाश तीर था, एडी गन्स थीं। और उनका तो क्या आर्मामेंट हमारे यहां आया, हमारे यहां क्या नुकसान हुआ, यह तो पूरी दुनिया के सामने एक तरह से ऑडिट और स्क्रूटनी के लिए ओपन है, इस पर बहुत बार चर्चा भी हो चुकी है।

सवाल- अभी जो हमारे आम लोग हैं और उसमें भी खासकर युवा पीढ़ी जो Gen-Z है, वह सेना को ज्यादातर खबरों या सोशल मीडिया पर देखती है। उसे आप 1971 की पाकिस्तान पर विजय, उसके टुकड़े होना और विजय दिवस का महत्व कैसे समझाएंगे?

जवाब- नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि जो आज की जनरेशन है उसको यह सबसे पहले मैं अपील करता हूं कि उन्हें यह जानना चाहिए कि दुनिया के किस भूभाग में भारत लोकेटेड है। भारत जिस जियो पॉलिटिकल सिचुएशन में स्थित है, भारत की चुनौतियां क्या हैं? भारत की चुनौतियों को इतिहास और स्टोरी के माध्यम से पहले सुनना चाहिए, पढ़ना चाहिए, जानना चाहिए, वो ये कोशिश कर भी रहे होंगे। आजकल तो ये जानना बड़ा ईजी भी है।

उसके बाद उनको जानना चाहिए कि इवोल्यूशन जो पिछले दशक से अब तक का हुआ, उसकी जर्नी क्या रही। कई बार क्या होता है बच्चे उसको उतनी डीपली नहीं पढ़ते, लेकिन उन्हें इस जर्नी को बहुत डीपली समझना चाहिए। समझने के बाद उनको यह जानने की जरूरत है कि भारत की चुनौतियां क्या हैं आने वाले दिनों में। क्योंकि जनरेशन बदल जाएगी। ओल्ड विंटेज टाइम के लोग चले जाएंगे इस दुनिया से। जिसकी जिस दिन जिसकी तारीख आएगी वो जाएगा। लेकिन जनरेशन और भारत रहेगा।

उस जनरेशन को भारत की चुनौतियों, चुनौतियों से जुड़े हुए जो भारत का रिस्पॉन्स सिस्टम है, जो हमारा ग्रोथ इंजन है, उस ग्रोथ इंजन पर फोकस करना चाहिए। और उसको जरूरी नहीं है मिलिट्री ड्रेस में। नॉन-मिलिट्री ड्रेस यानी नॉन-मिलिट्री पर्सन, यूथ, आज की तारीख में 20 लाख एनसीसी की संख्या होने जा रही है। टेरिटोरियल आर्मी है, उसके अलावा सिविल डिफेंस है। इंजीनियर्स हैं, साइंटिस्ट हैं, रिसर्चर्स हैं, उनका बहुत बड़ा रोल है इस मुहिम को आगे ले जाने के लिए। क्योंकि अभी एक इंफॉर्मेशन वॉरफेयर का भी बहुत बड़ा मुद्दा है।

लड़ाई आप लड़ने से पहले या तो हार जाते हैं या जीत जाते हैं। क्योंकि हमारे अपोनेंट, हमारे एडवर्सरीज ने झूठी मीडिया इनपुट की फैक्ट्रीज खोल रखी हैं। सुबह से रात तक लड़के यंग बॉयज यही काम करते हैं। तो पब्लिक के परसेप्शन को इंपैक्ट करती हैं वो चीजें। तो इन्हें इस पर भी बहुत ज्यादा सोचना चाहिए कि क्या मार्केट से चीज आ रही है, उसमें क्या लेना है?

यानी कई बार शॉर्ट-शॉर्ट वीडियो, इनपुट, गॉसिप इन दी कैम्पसेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटीज, हॉस्टल्स में जो बच्चों के आपस में छोटे-छोटे इनपुट पर गॉसिप होते हैं, उसकी वेरासिटी को देखना चाहिए कि इसमें तथ्य क्या है। उनको जितनी बड़ी चुनौती इस बात की है कि हम दुश्मन के बारे में क्या कहें, उससे बड़ी चुनौती इस बात की हो गई है कि दुश्मन के फैलाए हुए दुष्प्रचार में क्या तथ्य है और क्या तथ्य नहीं है। यानी सत्य को असत्य से अलग करना। यह बहुत बड़ा काम है और यह पहले तो माइंड को इंपैक्ट करता है। तो आई थिंक दे शुड टेक इट एज अ वेरी इंपॉर्टेंट एरिया टू कल्टिवेट।

सवाल- जब से 1971 का युद्ध हुआ है, तब से सीमा की सुरक्षा में क्या-क्या चुनौतियां पहले से बदली हैं? तब से सर्विलॉन्स में, कम्युनिकेशन में क्या-क्या बड़े बदलाव आए हैं?

जवाब- उन्होंने कहा कि तब के बॉर्डर और आज के बॉर्डर में बहुत बड़ा अंतर है। तब दुनिया का सबसे बड़ा कॉन्फ्लिक्ट जोन पाकिस्तान, उस समय तो उसको ईस्ट पाकिस्तान और वेस्ट पाकिस्तान बोलते थे। और फिर 1971 में बांग्लादेश बना। तो दो सबसे चुनौतीपूर्ण देशों के साथ 4000 और 3000, यानी कुल 7350 किलोमीटर का जो लैंड बॉर्डर है, वो हमारा इन दो सबसे खतरनाक देशों के खिलाफ है। 

बांग्लादेश को मैं खतरनाक आज के माहौल में कह रहा हूं। तब यह पूरे बॉर्डर खुले थे। परले ओपन बॉर्डर था। इस पर कोई भी फेंसिंग नहीं थी। कोई भी फिजिकल बैरियर नहीं था। तो उस समय बॉर्डर गार्डिंग कितना डिफिकल्ट था जो कि आप एक भौगोलिक लाइन से उसको गार्ड करते थे। पूरे बॉर्डर क्रॉसिंग के लिए प्रोन था। कोई कहीं से भी आ और जा सकता था। और जो आज की तारीख का इनफिल्ट्रेशन और इलीगल लोगों की घुसपैठ की चर्चा होती है उसी की देन है।

लेकिन पंजाब के आतंकवाद में हमने बहुत बड़ा सबक सीखा। जब पाकिस्तान ने पंजाब के खुले बॉर्डर का बेजा इस्तेमाल किया और यहां के भटके हुए नौजवानों को उन्होंने पाकिस्तान के अंदर ट्रेनिंग दी, Kalashnikov Rifle दिए और पंजाब के अंदर एक सेपरेट सिख स्टेट बनाने के मुद्दे को सपोर्ट किया। उसी पाकिस्तान ने अपने अंदर आधे कटे हुए पंजाब को कभी सिख की टेरिटरी नहीं माना। पंजाब ही तो बंटा 1947 में। तो जो उनके पास पंजाब था उसको बना देते। उसको बना देना चाहिए था ना उनको सिख लैंड। वो तो नहीं बनाया उन्होंने।

तो जो वो काम किया, उसके बाद पंजाब एक्शन प्लान के तहत पंजाब बॉर्डर पर टोटली फेंसिंग हुई और हमारा इनफिल्ट्रेशन रुका। लेकिन उसी लाइन पर पाकिस्तान ने फिर जम्मू और कश्मीर बॉर्डर को एक्सप्लॉइट करने की कोशिश की। फिर उसकी फेंसिंग हमने 2004-05 तक कंप्लीट की। लेकिन तब तक कश्मीर में आतंकवाद दूसरे लेवल पर चला गया था। उसका मुख्य कारण यही था कि जो हमारे साथ पाकिस्तान का बॉर्डर लगता है, उसका उन्होंने एक लॉन्चिंग पैड, एक क्रॉसिंग रूट के तौर पर इस्तेमाल करके भारत के अंदर ट्रेंड टेररिस्ट भेजे।

लेकिन आज की बॉर्डर गार्डिंग पहले से बहुत अलग है। अभी क्या है कि एक तो फेंसिंग हो गई है। बंगाल का कुछ एरिया है जिसमें फेंसिंग नहीं है। और लाइन ऑफ कंट्रोल का कुछ एरिया है जहां अभी फेंसिंग नहीं हो पा रही है क्योंकि वहां की ज्योग्राफिकल कंडीशन अलग है। तो फेंसिंग होने से इलीगल एंट्री पर बहुत रोक लगी है। दूसरा अभी टेक्नोलॉजी इंप्रूव हुई है तो स्मार्ट फेंसिंग में वो कन्वर्ट हो रहा है। और उस फेंसिंग के साथ डबल लेयर फेंसिंग है। और स्मार्ट फेंसिंग में क्या है कि अगर कोई असामाजिक तत्व उसे काट के घुसने की कोशिश करे, तो उससे कनेक्टेड दूसरी फेंस अपने आप खुल जाती है। यानी क्रॉस आप नहीं कर सकते।

इसके साथ-साथ फ्लड लाइट, कंप्लीट एलईडी लाइट रात का प्रोटेक्शन है, पीटीजेड कैमराज हैं, हैंडहेल्ड थर्मल इमेजर है, लॉन्ग रेंज ऑब्जर्वेशन एंड सर्विलांस सिस्टम है, हैंडहेल्ड थर्मल इमेजर तो है ही, डे सर्विलांस है। इसके अलावा हमारे रडार्स हैं जो कि बॉर्डर की चौकसी और रखवाली कर रहे हैं और इस पर काम हो रहा है।

लेकिन साथ-साथ चुनौतियां भी हैं। जो सबसे बड़ी चुनौती है इस समय पंजाब और जम्मू बॉर्डर पर है। क्योंकि पाकिस्तान ने जो ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया है, उस ड्रोन से हमारी सुरक्षा को बहुत खतरा है। ड्रोन के साथ, खासकर के ऑपरेशन सिंदूर के बाद, उन्होंने नारकोटिक्स भेजने शुरू किए हैं और यह ज्यादा तादाद में आ रहा है। और यह छोटे ड्रोन होते हैं, कोई-कोई थोड़े बड़े ड्रोन भी होते हैं, और इन ड्रोन से हथियार भी सप्लाई हो रहे हैं। यह एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है।

और सबसे बड़ी सरप्राइज की बात है कि आज अगस्त महीने में चाइना में कोई ड्रोन लॉन्च हुआ, वो पंजाब में नवंबर महीने में पाया जाता है। टर्की में कोई ड्रोन लॉन्च हुआ, वो आपको लेटेस्ट वर्जन वहां मिलता है। तो एंटी-ड्रोन हमारे पास कैपेसिटी अभी कम है। एंटी-ड्रोन कैपेसिटी का कम होना हमारे लिए चिंता का विषय है। उसके लिए काम हो रहा है। जितना जल्दी यह टेक्नोलॉजी आए, जिससे कि हम इस समस्या से उबर सकें। अदरवाइज, पंजाब और जम्मू बॉर्डर पर ड्रोन के माध्यम से ड्रॉप किए गए नारकोटिक्स या हथियार हमारे लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं।

अगली चुनौती हमारी बंगाल में है क्योंकि बंगाल में बहुत सारा एरिया नॉन-फिजिबल गैप है जिसमें फेंसिंग लगाना संभव नहीं है। पूरा बॉर्डर रिवराइन है। नदी से ओत-प्रोत है, पानी भरा रहता है, फेंसिंग रुकती नहीं है। और कुछ एरिया में अभी नई सरकार आने के बाद बांग्लादेश की तरफ से भी विरोध हो रहा है। वह वहां फेंसिंग लगाने का विरोध कर रहे हैं क्योंकि शेख हसीना की सरकार अभी वहां नहीं है। और सुंदरबन का एरिया 115 किलोमीटर का वाटरी एरिया जिसके अंदर फिजिकली मैन करना बहुत मुश्किल काम है। उस एरिया से अभी कोई ऐसा विजिबल या कोई सिग्निफिकेंट रिपोर्ट तो नहीं मिली है, लेकिन वह एरिया वल्नरेबल है, चिंता का विषय है।

इन मुद्दों पर हमें काम करने की जरूरत है और टेक्नोलॉजी ड्रिवेन काम करने की जरूरत है। और जो बीच-बीच में आंतरिक सुरक्षा में हमारे देश में जिस तरह की डेमोक्रेसी है, हर साल इलेक्शंस होते हैं, राज्य के इलेक्शंस होते हैं, पंचायत इलेक्शन होते हैं। जो ट्रूप्स बार-बार बॉर्डर एरिया से निकाल के इन कामों के लिए भेजे जाते हैं, उसका भी बॉर्डर गार्डिंग पर थोड़ा एडवर्स इंपैक्ट पड़ रहा है। यह चिंता सरकार को व्यक्त की गई है, बट उससे भी बॉर्डर गार्डिंग पर असर तो पड़ रहा है। ये सब एरिया है जिन्हें हमें देखने की आवश्यकता है।

सवाल- आने वाला जो भारत है, यानी 2030 का भारत, 2040 का भारत, उस समय भारतीय सेना के सामने क्या चुनौतियां होंगी? वो सीमा सुरक्षा की चुनौतियां होंगी, साइबर वॉरफेयर की चुनौतियां होंगी, ड्रोन वॉर की चुनौतियां होंगी या फिर कुछ और? 

जवाब- नरेंद्र नाथ धर दुबे ने बताया कि भारत जल्द थर्ड लार्जेस्ट इकॉनमी बनेगा। इसको तो कोई रोक नहीं सकता, जो हमारा ग्रोथ रेट है उस हिसाब से। हमारा ग्रोथ रेट वर्ल्ड में सबसे ऊपर है इस समय। और पाकिस्तान सबसे बड़ा एडवर्सरी है, तो पाकिस्तान की इकॉनमी, पाकिस्तान की जीडीपी हमारे देश के छत्तीसगढ़ राज्य से भी कम है फॉर योर इन्फॉर्मेशन। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से भी कम है। तो 2030 में हमारी इकोनॉमिक सिचुएशन और बेहतर होगी।

दूसरी चीज है कि कंटिन्यूटी ऑफ पॉलिटिकल परमानेंसी इज वेरी इंपॉर्टेंट। देश के अंदर जो भी सरकार है उसका कंटिन्यू रहना, लीडरशिप का कंटिन्यू रहना, यह डिसीजन मेकिंग प्रोसेस का बहुत बड़ा अंडरलाइन पॉइंट है। मैं नहीं कह रहा हूं कि हम चाइना का सिस्टम अडॉप्ट कर लें। चाइना में लंबे समय से शी जिगपिंग हैं, अकेला रूलर है। आप रशिया का एक्जाम्पल ले लीजिए। वहां पर कंटिन्यूटी ऑफ लीडरशिप है। हमारा पॉलिटिकल सिस्टम उनसे अलग है। तो हमारे पॉलिटिकल सिस्टम में भी लीडरशिप की कंटिन्यूटी और मजबूत सरकार पहली जरूरत है, नहीं तो जितने नियम कानून बनाए जाते हैं, जितने प्रोजेक्ट और डेवलपमेंट की योजना बनती है वो बैक सीट पर चली जाती है।

दूसरा हमें जो चुनौती दिख रही है वो आने वाले टाइम में साइबर वॉरफेयर और जीपीएस गाइडेड वेपनरी सिस्टम रूल करने जा रही है आने वाले टाइम में। यानी योर ड्रोन, अनआर्म्ड व्हीकल, मतलब कोई भी सैनिक जाएगा नहीं। ये हमारी बहुत बड़ी चुनौती बनने जा रही है। साइबर वॉरफेयर, जिसमें कि इंडिया को तो इंफॉर्मेशन वॉरफेयर का एक अपना डिपार्टमेंट ही बनाना चाहिए अलग से। इंफॉर्मेशन वॉरफेयर अभी इतनी जरूरत बन गई है भविष्य के लिए। तो एंटी-ड्रोन, लॉयटरिंग अम्युनेशन के खिलाफ, अनआर्म्ड कॉम्बैट फाइटर जेट, भारत को फाइटर जेट, मुझे उम्मीद है और मेरी शुभकामना है कि 2030 तक हम इंडिजिनस फाइटर जेट इस लेवल का बना लें। यही एक एरिया है जिसमें अभी हम थोड़ा लैग कर रहे हैं कि हम उस लेवल पर वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं।

और इकॉनमी का जो ग्रोथ है यह मेंटेन रहे, यह और ऊपर जाए, और हम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काफी अग्रेसिव होकर आएं। दुनिया के मार्केट में हम हम छा जाएं। यह हमारी एक बहुत बड़ी चीज होनी चाहिए, जिसका सबसे अंडरलाइन पॉइंट है स्वदेशी, भारतीय, भारतीयता, आत्मनिर्भर भारत। अपनी बनाई हुई चीज, जिस दिन अपनी बनाई हुई बिजली की लड़ी हम चाइना की बिजली लड़ी से सस्ता बनाएंगे, उस समय मार्केट हमारा होगा।

चाइना आज की तारीख में क्या कर रहा है? इतना सामान आपके पास भेज रहा है। वर्ल्ड मार्केट को डंप कर रहा है। जिस कंट्री में वो सामान भेजता है वहां के मूल्य से कम पैसे में भेजता है। पब्लिक उसको खरीदती है। किसकी इकॉनमी बेटर होगी? चाइना की इकॉनमी बेटर होगी। हमको ये बात समझनी पड़ेगी। गोदरेज का साबुन कितने लोग खरीदते हैं हमारे में से? सिंथॉल कितने लोग खरीदते हैं? संतूर कितने लोग खरीदते हैं? वी आल्सो गो फॉर दी फॉर एवरीथिंग व्हिच इज बेसिकली एक्सपोर्टेड बाय दी डेवलप्ड कंट्रीज।

एज ए सिटीजन भी हमको देखना पड़ेगा क्या भारतीय है, क्या भारतीय नहीं है। और यह भारत के इतिहास में चीज प्रूव हो चुकी है। बंकिम चंद्र चटर्जी पर जाइए, रवींद्रनाथ टैगोर पर जाइए, लाला लाजपत राय पर जाइए या अंग्रेजों भारत छोड़ो, नमक छोड़ो, हम विदेशी कपड़े का बहिष्कार करते हैं। यह चीज भारत कर चुका है और इसका ब्रिटिश इंपीरियलिज्म पर कितना इंपैक्ट पड़ा था, यह आप हिस्ट्री देखें तो आपको पता लगेगा। यह हमें कहीं देखना पड़ेगा।

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