NEET-UG परीक्षा रद्द होने से देश भर में तकरीबन 22 लाख 79 हजार छात्रों का भविष्य इस वक्त अधर में लटका हुआ है। 3 मई को परीक्षा हुई थी, पेपर लीक की जानकारी मिलने के बाद परीक्षा को रद्द कर दिया गया। National Testing Agency (NTA) ने परीक्षा को रद्द कर फिर से इम्तहान कराने का ऐलान किया। NTA का कहना है कि ये फैसला छात्रों के हित में लिया गया है। जिन बच्चों ने 3 मई को NEET की परीक्षा दी, उन्हें दोबारा फॉर्म नहीं भरना होगा, फीस नहीं देनी होगी, जो फीस पहले दी थी, वह भी वापस की जाएगी, बच्चों के परीक्षा केंद्र नहीं बदले जाएंगे, परीक्षा की नई तारीख का ऐलान जल्द होगा।
ये सब तो ठीक है लेकिन सवाल ये है कि आखिर पेपर लीक कैसे हो गया? पेपर लीक होने का सिलसिला थम क्यों नहीं रहा? इस बार पेपर लीक कराने का जो तरीका अपनाया गया, वह भी हैरान करने वाला है। NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने माना कि 3 मई को जो परीक्षा हुई थी, उसके बारे में 7 मई को पेपर लीक की शिकायत NTA को मिली, जो पेपर लीक हुआ था, उसकी PDF कॉपी कुछ छात्रों ने NTA को भेजी, इसकी जांच हुई तो पता लगा कि जो गेस पेपर मार्केट में बेचे जा रहे थे। उनमें से कुछ प्रश्न हूबहू नीट के प्रश्नपत्र में आए थे। इसीलिए NTA ने परीक्षा रद्द करने का फैसला किया।
अभिषेक सिंह ने कहा कि NTA एक हफ्ते के भीतर परीक्षा की नई तारीख का ऐलान कर देगा जिससे छात्रों का साल बर्बाद न हो। अब तक जो जांच हुई है उससे ये साफ हो गया है कि नीट का पेपर छपने से पहले ही नासिक की प्रिंट प्रेस से लीक किया गया। इसके बाद हरियाणा, राजस्थान, बिहार, केरल, जम्मू कश्मीर, आन्ध्र प्रदेश और कई अन्य राज्यों में ये प्रश्न पत्र मोटी रकम की ऐवज में छात्रों के बीच guess papers के रूप में बांटे गये।
पता ये लगा है कि नासिक प्रिंटिंग प्रेस से नीट के पेपर की हार्ड कॉपी निकाली गई, इसे गुरुग्राम में एक डॉक्टर को भेजा गया, गुरुग्राम में पेपर के सवालों की हाथ से लिखी कॉपी तैयार की गई। इस हैंड रिटेन कॉपी को जयपुर भेजा गया। जयपुर से ये कॉपी जमवा रामगढ़ में एक शख्स के पास पहुंची। इस शख्स ने इस कॉपी को सीकर में कोचिंग चलाने वाले शख्स को बेचा। कोचिंग संचालक ने इसकी कई कॉपियां करवाई और उन्हें आन्ध्र प्रदेश, बिहार, जम्मू कश्मीर, केरल, उत्तराखंड जैसे कई राज्यों में पांच लाख रुपये से बीस लाख रुपये तक में बेचा।
इसके बाद जैसे जैसे परीक्षा की तारीख करीब आती गई, रेट गिरता गया और आखिर में इस गैस पेपर को व्हाट्सएप के जरिए 30-30 हजार रुपये में बेचा गया। गेस पेपर में ज्यादातर वही सवाल आए जो प्रश्नपत्र में थे। राजस्थान SOG ने कडियां जोड़ ली हैं, कई राज्यों से 18 लोगों को हिरासत में लिया गया है। सबसे ज्यादा लोग राजस्थान से पकड़े गए हैं।
नीट पेपर लीक का मास्टरमाइंड राजस्थान का मनीष यादव है और उसे SOG ने गिरफ्तार कर लिया है। उसके अलावा मीडिएटर अविनाश लांबा और पेपर डिस्ट्रीब्यूटर राकेश मंडावरिया को भी गिरफ्तार किया गया है। सीकर के एक कोचिंग संचालक को भी हिरासत में लिया गया है। राजस्थान SOG ने जमवा रामगढ़ से उस शख्स को भी गिरफ्तार किया है, जिसके पास सबसे पहले पेपर पहुंचा था। इस व्यक्ति के दोनों बेटे डॉक्टर हैं।
उधर, नासिक पुलिस ने शुभम खैरनार नाम के उस शख्स को पकड़ लिया जिस पर नासिक की प्रिंटिंग प्रेस से पेपर की हार्ड कॉपी लीक करने का शक है। शुभम खैरनार के पिता डॉक्टर हैं। उसका भाई दवा की दुकान चलाता है। शुभम को CBI के हवाले कर दिया गया है।
सरकार ने नीट के लिए फूल प्रूफ इंतजाम किए थे। प्रिंट होने के बाद पेपर को जिन गाड़ियों से सेंटर्स पर भेजा गया, वो गाडियां GPS से लैस थीं, इनमें जैमर थे, एग्जाम सेंटर्स में AI-असिस्ट सीसीटीवी समेत 5G जैमर्स जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन इस बार पेपर लीक गैंग ने नया तरीका निकाला। प्रिंटिंग से पहले ही पेपर की हार्ड कॉपी निकाल ली, इसके सारे सवाल कॉपी नहीं किए गए। इस पेपर के 150 सवाल लिए गए, हाथ से लिख कर डेढ़ सौ पेज का एक guess paper तैयार किया गया। इसमें तीन सौ से ज्यादा सवाल रखे गए। उनमें नीट के 150 सवालों को शामिल किया गया।
ये सब इसलिए किया गया ताकि किसी को शक न हो। जांच एजेंसियां इसके चक्कर में गुमराह हो गईं। ये गेस पेपर हजारों लोगों तक पहुंचा। नीट के 720 नंबर के पेपर में 600 नंबर के सवाल इसी गेस पेपर से आए। बायोलॉजी के 90 में से 90 सवाल वही थे, जो गेस पेपर में दिए गए थे। कहीं कोई कोमा फुलस्टॉप का अंतर नहीं था। केमिस्ट्री के 45 में से 35 सवाल ज्यों का त्यों आए।
अब सवाल ये है कि अगर पूरा पेपर लीक हो गया था तो सिर्फ 600 नंबर के सवाल ही कॉपी क्यों किए गए ? इसकी दो वजह हैं। पहली, जांच एजेसिंयों को गुमराह करना, जिससे किसी को पेपर लीक का शक न हो। दूसरा, अगर किसी छात्र के 720 में से 600 अंक आ जाएं तो उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलना तय हो जाता है।
प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में MBBS की फीस एक करोड़ से डेढ़ करोड़ रुपए तक होती है, जबकि सरकारी कॉलेज में फीस सवा लाख रुपए तक है। इसलिए ज्यादातर लोग अपने बच्चों को सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने की कोशिश में पेपर लीक माफिया के चक्कर में फंस जाते हैं। लेकिन इसका नुकसान उन बच्चों का होता है, जो ईमानदारी से पढ़ाई करते हैं, मेहनत करके परीक्षा पास करने की कोशिश करते हैं।
NTA बनाया तो गया था सुरक्षित तरीके से मेडिकल पढ़ाई में दाखिले के लिए, विश्वस्तरीय शैक्षिक ढांचा तैयार करने के मकसद से, लेकिन नौ साल में NTA पेपर लीक और नाकामी की मिसाल बनकर रह गया। NTA कभी प्रिंटिंग कराने में फेल हुआ, कभी ट्रांसपोर्ट करने में पेपर लीक हुआ, तो कभी पेपर बनाने वाले ने ही लीक कर दिया।
हद तो तब हो गई जब NTA के महानिदेशक छात्रों से कहने लगे कि पेपर लीक हो तो NTA को तुरंत सूचित करें। तो फिर NTA क्या करेगा? परीक्षा रद्द करेगा? फिर से इम्तिहान की तारीख देगा? CBI को जांच सौंपेगा? क्या NTA का सिर्फ यही काम रह गया है? अब बहुत हो चुका। या तो NTA फूलप्रूफ प्रणाली तैयार करे। अगर नहीं कर सकता तो परीक्षा की जिम्मेदारी किसी और को सौंप दी जाए। (रजत शर्मा)
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