जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इन दिनों एक नया तूफान खड़ा हो गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एक सनसनीखेज दावा किया है कि उनके विधायकों को तोड़ने के लिए ₹200 करोड़ का ऑफर दिया गया है। इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में इस दावे की हकीकत और इसके पीछे छिपे राजनीतिक निहितार्थों पर विस्तार से चर्चा की गई। इस शो में एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
उमर अब्दुल्ला का आरोप है कि भाजपा के एक वरिष्ठ नेता, जो सुप्रीम कोर्ट के वकील भी हैं, उन्होंने उनके विधायकों को खरीदने की कोशिश की। इसके जवाब में भाजपा ने उमर अब्दुल्ला को मानहानि का कानूनी नोटिस भेजकर सात दिनों के भीतर लिखित माफी मांगने की मांग की है, अन्यथा उन पर ₹100 करोड़ का केस करने की चेतावनी दी है।
जम्मू कश्मीर विधानसभा की स्थिति
वर्तमान विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 42 और कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं, जो बहुमत के आंकड़े (46) से ऊपर हैं। विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि जब उमर की सरकार स्थिर है, तो भाजपा ₹200 करोड़ खर्च करके और 17 अतिरिक्त विधायकों का जुगाड़ करके सरकार बनाने का जोखिम क्यों उठाएगी? आरोपों के पीछे की ‘क्रोनोलॉजी’ और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव विशेषज्ञों का मानना है कि उमर अब्दुल्ला के इन आरोपों के पीछे कई गहरी वजहें हो सकती हैं।
उमर अब्दुल्ला के आरोपों की संभावित वजहें
अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचना: जिस समय पीओजेके में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, ऐसे समय उमर अब्दुल्ला द्वारा कश्मीर में अस्थिरता और सरकार गिराने के आरोप लगाना एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश है कि कश्मीर में भी हालात सामान्य नहीं हैं।
पूर्ण राज्य के दर्जे का दबाव: उमर अब्दुल्ला लगातार केंद्र सरकार पर पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए दबाव बना रहे हैं। उनका मानना है कि पुलिस और प्रशासन हाथ में न होने के कारण वे ‘शक्तिहीन’ मुख्यमंत्री महसूस कर रहे हैं।
विकास कार्यों से ध्यान भटकाना: सूत्रों के अनुसार, उमर सरकार पर फाइलों को लटकाने और विकास कार्यों में देरी के आरोप लग रहे हैं। उनके अपने विधायक और मंत्री उनकी कार्यशैली से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं।
प्रशासनिक चुनौतियां और सुरक्षा का सवाल: केंद्र सरकार ने उचित समय पर पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा किया है, लेकिन हालिया आतंकी घटनाओं (जैसे पहलगाम हमला) के मद्देनजर अभी यह ‘उचित समय’ नहीं माना जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि जब तक सुरक्षा की स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं हो जाती, पुलिस और प्रशासन का नियंत्रण स्थानीय राजनेताओं को देना जोखिम भरा हो सकता है।
यूपी में विपक्षी गठबंधन के अंदर मुस्लिम वोट की जंग
कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में उत्तर प्रदेश की राजनीति पर चर्चा हुई, जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच मुस्लिम वोटों को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी को ‘बोलने वाले मुसलमान’ पसंद नहीं हैं। मसूद ने दावा किया कि देश का अल्पसंख्यक अब राहुल गांधी की तरफ देख रहा है। उन्होंने अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आजम खान का उदाहरण देते हुए सपा की भूमिका पर सवाल उठाए। इसके जवाब में समाजवादी पार्टी के नेताओं ने खुद को मुसलमानों का असली हितैषी बताते हुए कहा कि उनके नेताओं (मुलायम सिंह और अखिलेश) को भाजपा द्वारा ‘मुल्ला मुलायम’ या ‘अकिलुद्दीन’ जैसे नाम दिए गए, जो उनके समर्पण का प्रमाण है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सियासी खींचतान भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि विपक्ष के भीतर ही ध्रुवीकरण की स्थिति बन रही है।
कुल मिलाकर, कश्मीर में उमर अब्दुल्ला के आरोप हों या यूपी में कांग्रेस-सपा की खींचतान, दोनों ही स्थितियां आने वाले समय में देश की राजनीति में बड़े बदलावों का संकेत दे रही हैं। कश्मीर में जहां अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव सेट करने की कोशिश हो रही है, वहीं यूपी में मुस्लिम नेतृत्व को लेकर एक नई जंग छिड़ गई है।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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