8 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी/भारती द्विवेदी
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मैं बहुत गरीब परिवार से आया हूं। ऐसे परिवार से जहां सोचना पड़ता था कि आज दाल बनी है तो सब्जी नहीं बनाते हैं। सब्जी कल बन जाएगी। ऐसे में, जब मैं सफलता के मुकाम पर पहुंचा तो पता था कि मेहनत करके आया हूं और आगे भी मेहनत की वजह से ही सर्वाइव कर पाऊंगा।

कभी ढंग के खाने के लिए तरसे दिनेश लाल यादव सालों के संघर्ष के बाद अब भोजपुरी इंडस्ट्री का बड़ा नाम हैं। दो दशक के लंबे करियर में उन्होंने भोजपुरी इंडस्ट्री से हिंदी इंडस्ट्री होते हुए ओटीटी तक का सफर तय किया है, जो बदस्तूर जारी है।
आज की सक्सेस स्टोरी में दिनेश लाल यादव निरहुआ की कहानी…

पापा के स्टेज से सिंगिंग की शुरुआत हुई
बचपन में हम लोग कोलकाता में झुग्गी में रहते थे। वहां पर पापा को मेरे चचेरे भाई और बिरहा गायक विजय लाल यादव के चाचा के नाम से पहचाना जाता, तो पापा को बहुत गर्व होता था। भाई की वजह से मिलने वाले सम्मान से पापा को अच्छा लगता था। पापा खुद भी गाते थे, वो साल में एक दिन कृष्ण जन्माष्टमी के दिन प्रोग्राम करते थे।
पापा की इच्छा थी कि मैं भी गायक बनूं। वो मुझे अपने प्रोग्राम में गाने का मौका देते और कहते कि सीख लो। मंच से गाना पड़ेगा। पापा के मंच से ही मेरी सिंगिंग की शुरुआत हुई।
कोलकाता में हमने बारहवीं तक की पढ़ाई की। फिर पापा रिटायर हुए तो हम लोग अपने गांव गाजीपुर लौट गए। पापा की ख्वाहिश थी कि मैं पढ़ाई करके बैंक में कैशियर की नौकरी करूं। पापा की इच्छा पूरी करने के लिए मैं बीकॉम की पढ़ाई करने लगा।
मिडिल क्लास फैमिली में जैसा होता है कि एक आदमी 60 साल काम करके भी अपनी जमा-पूंजी से एक कमरे का घर बनवा पाता है। हमारे पास भी मिट्टी का टूटा-फूटा घर था। पापा ने अपने पैसों से एक घर बनवाया और बहन की शादी कर दी। हम सब बेरोजगार थे, फिर घर में दिक्कत आने लगी।
घर चलाने के लिए पढ़ाई छोड़ कमाने लगा
जब घर चलाना मुश्किल लगने लगा, तब पापा ने एक दिन कहा कि मैं सोच रह हूं कि अब मुंबई चला जाऊं। मैंने उनसे पूछा कि मुंबई में आप क्या करेंगे? उन्होंने कहा कि गांव के बहुत सारे लोग वहां कमा रहे हैं तो वो भी कमाएंगे। मैंने उनसे कहा कि नहीं, अब आपकी वो उम्र नहीं है। अब कहीं भी जाना होगा तो हम जाएंगे।
आप कहेंगे तो मैं पढ़ाई छोड़कर कमाने चला जाऊंगा, लेकिन अब आप कहीं नहीं जाएंगे। उस वक्त तक मैंने गाना गाना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे मेरी गायिकी चलने लगी। मुझे प्रोग्राम मिलने लगे।
ऐसे में मैं पढ़ाई से दूर और स्टेज के पास होता गया। पढ़ाई से ज्यादा ध्यान मैं स्टेज शो और गायिकी पर देने लगा। फिर मेरा एक एल्बम भी आ गया और वो खूब चला। इस गाने की वजह से मुझे ‘निरहुआ सटल रहे’ गाना गाने का मौका मिला। इस गाने के आने के बाद ही मुझे मेरे स्ट्रगल का फल मिलने लगा।

निरहुआ जब छोटे थे, तो अपने माता-पिता के साथ कोलकाता में एक झुग्गी में रहते थे।
दबंगई की वजह से गाजीपुर छोड़ना पड़ा
बनारस, गाजीपुर, गोरखपुर, आजमगढ़ इन सारे बेल्ट में बाहुबलियों का राज था। कुछ का दबदबा ऐसा था कि वो जेल से ही चुनाव लड़कर जीत जाते थे। मैं जब कोलकाता से पढ़कर आया तो एक समझ विकसित थी। मुझे पता था कि समाज में हमारा क्या अधिकार है। कोई भी हमें अपनी आस्था या किसी भी काम के लिए फोर्स नहीं कर सकता। ऐसे में जब कुछ घटनाएं घटीं तो मैं हैरान था। मुझे लगा कि अजीब जगह है। यहां से जाना ही पड़ेगा।
दरअसल, गाजीपुर में मेरा एक शो था, वहां पर सारे बिरहा गाने वाले सिंगर थे। हम सारे सिंगर शो शुरू करने से पहले सरस्वती या गणेश वंदना या फिर भजन गाते हैं। फिर आगे पूरा प्रोग्राम करते हैं। वहां पर एक भाई था, वो भिड़ गया। डिमांड करने लगा कि पहले निरहुआ सटल रहे गाओ। हम लोगों ने समझाया कि हमारी कुछ मान्यताएं और सिस्टम है। भजन शुरू करके पूरी रात तो प्रोग्राम ही करना है, लेकिन वो सुनने को तैयार नहीं था। मैं भी भिड़ गया। मैंने उसे उठाकर पटक दिया।
अक्षय कुमार की फिल्मों से शौक चढ़ने के बाद मैं कराटे और ताइक्वांडो सीख चुका था। मैं उसके सीने पर बैठ गया और बोला कि तुम्हें पता नहीं कि किससे भिड़ रहे हो। मैं साधारण दिख रहा हूं, इसका ये मतलब नहीं कि तुम हमको हल्के में लो। उस लड़ाई के बाद प्रोग्राम बंद हो गया। मेरे भाई ने उस पूरी लड़ाई को गंभीरता से लिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह के तुम्हारे तेवर हैं, वो यहां के लिए ठीक नहीं है, तुम मुंबई जाओ। मैंने भी सोचा ठीक ही कह रहा है क्योंकि मुझसे गलत चीज बर्दाश्त नहीं होगी।
करिश्मा कपूर के चक्कर में पापा ने बहुत मारा
मैंने करिश्मा कपूर को पहली बार फिल्म ‘अनाड़ी’ में देखा और उनका फैन हो गया। उसके बाद करिश्मा कपूर की कोई ऐसी फिल्म नहीं होगी, जो मैंने नहीं देखी। इस कदर उनका फैन हो गया कि पूरे कमरे में सिर्फ उनके पोस्टर लगे होते थे। करिश्मा की कोई भी फिल्म आती थी तो मैं फर्स्ट डे-फर्स्ट शो देखता था।
एक बार मैं एनसीसी की ट्रेनिंग ले रहा था, उस दौरान आर्मी कैंप में था। उसी दौरान मुझे पता चला कि करिश्मा कपूर की कोई फिल्म आ रही है। मैंने अपने बटालियन के ऑफिसर से कहा कि डेली यूज का कुछ सामान घट गया है। सामान लेने के लिए मुझे बाहर जाना पड़ेगा। उन्होंने जाने की अनुमति दे दी। मैं बाहर निकला और करिश्मा कपूर की फिल्म देखने लगा। जब कई घंटे बाद मैं कैंप में लौटा तो मेरे ग्रुप के सारे लड़के बाहर मेरा इंतजार कर रहे थे। सबका मुंह लटका हुआ था।
मैंने पूछा क्या हुआ तो उन्होंने मुझे बताया कि किसी को खाना नहीं मिला है। सीओ साहब ने कह दिया था कि जब तक तुम सब उसे लेकर नहीं आओगे, किसी को खाना नहीं मिलेगा। ये सुनकर मैं भी डर गया। जब मैं उन लड़कों के साथ सीओ साहब के पास गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि झूठ मत बोलना। मुझे बताना पड़ा कि मैं फिल्म देखने गया था। मुझे सजा के तौर पर पुशअप करने का ऑर्डर मिला। मुझे बिना रुके पुशअप करना था। बीच में मैं जब भी रुकता, पीछे से छड़ी लगती।

निरहुआ करिश्मा कपूर के इतने बड़े फैन हैं कि उन्होंने एक्ट्रेस की फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’ से प्रेरित होकर ‘निरहुआ हिंदुस्तानी’ फिल्म बनाई। इस फिल्म के दो सीक्वल भी रिलीज हो चुके हैं।
करिश्मा के चक्कर में पिताजी ने भी मुझे खूब कूटा है। वो किस्सा ऐसा है कि पिताजी घर की दीवारों पर जहां-जहां देवी की फोटो और कैलेंडर लगाए थे, उसके बगल में मैंने करिश्मा की फोटो लगा दी थी। मैंने भी एक इंच भी जगह नहीं छोड़ी थी, अपनी देवी की फोटो लगाने में। पापा नाराज होकर कहते थे कि कहीं और लगा लो। अब इसको भी हम अगरबत्ती दिखाएं? मैं कहता था कि दिखा लीजिए, वो भी तो देवी है। इस पर बिगड़कर पापा पिटाई कर देते थे।
रात-रात भर गाने के बाद ऑर्गनाइजर पैसे नहीं देते थे
मैं गरीब घर में पैदा हुआ और गरीबी देखी है। कोलकाता में पिताजी के साथ झुग्गी में रहकर पढ़ाई और गायिकी सीखी थी। मैं अपने काम को लेकर बहुत ईमानदार रहा हूं। जब मैंने स्टेज करना शुरू किया तो शुरुआती दिनों में अलग-अलग तरह का संघर्ष देखा। मेरे साथ ऐसा हुआ कि मैंने रात-रात भर स्टेज परफॉर्मेंस दी और जब सुबह हुई तो पैसे नहीं मिले। जिस इंसान ने प्रोग्राम कराया, वो भाग गया।
ऐसी स्थिति में मैं और मेरी टीम हारमोनियम, ढोलक और बाकी सामान लेकर पैदल मीलों चली है, लेकिन ऊपर वाला दुख देता है तो सुख भी देता है। एक ऐसा भी समय आया कि मेरे साथ मीलों पैदल चलने वाली टीम चार्टर्ड प्लेन में बैठकर फिजी और ऑस्ट्रेलिया में शो कर रही थी। जब हम सब चार्टर्ड प्लेन में साथ बैठते, तब एक-दूसरे से कहते कि चलो पैदल चलना सफल हुआ।
ट्रेन में दो सीट के बीच पेपर बिछाकर घर गया
मैंने एक एल्बम बनाया था ‘बुढ़वा मलाई खाई’। मेरा एल्बम हिट हुआ और ये मेरी लाइफ का टर्निंग पॉइंट रहा। मैं चाहता था कि करियर में कुछ बड़ा करूं तो मैंने अपनी टीम के साथ मिलकर ‘निरहुआ सटल रहे’ एल्बम बनाया। गाना बनाकर रिकॉर्ड करके हम लोग दिल्ली एक बड़ी कंपनी में गए और उनसे कहा कि इसे रिलीज कर दीजिए, लेकिन उनको ‘बुढ़वा मलाई खाई’ जैसा गाना चाहिए था। मैंने उनसे कहा कि वो किसी और का गाना है, वो नहीं बन सकता। मैं कुछ नया लेकर आया हूं, ये उसे भी ज्यादा हिट होगा।
उन्होंने मुझे कहा कि ठीक है फिर अपना गाना रख दो। बिक गया तो तुम्हें पैसे मिलेंगे। उन्होंने हमारे लिए बस इतना किया कि घर लौटने के लिए दिल्ली से बनारस का रिजर्वेशन टिकट करा दिया। हम लोगों ने उस टिकट को कैंसिल करा जो पैसा मिला, उससे चालू बोगी में बैठ गए। ताकि जो पैसा बचे उससे खाते-पीते घर चले जाएं। चालू बोगी में दो सीट के बीच पेपर बिछाकर दिल्ली से गांव पहुंच गए, लेकिन जब मेरा वो एल्बम आया तो हर जगह मेरा ही गाना बज रहा था।
गाने के हिट होते ही मुझे फोन आया कि अब आओ और गाने का वीडियो शूट कर लो। हम लोग फिर वापस दिल्ली पहुंचे। वहां पहुंचने पर मुझसे कहा गया कि गाने में मॉडल्स भी रहेंगी, आपका क्रोमा शूट हो जाएगा। मैंने उनसे साफ शब्दों में कहा कि मॉडल नहीं चलेगी, मेरा गाना है, मैं ही शूट करूंगा। उन्होंने माथा पकड़ लिया और कहा कि इसे कौन समझाए कि इसे कौन देखेगा?

उस वक्त वहां पर किसी बड़े स्टार का शूट होना था और उस स्टार को तैयार होने में एक घंटे का समय लगना था। जब मैं नहीं माना तो उन्होंने कहा कि आपके पास एक घंटे का समय है, उतनी देर में अगर शूट कर सकते हैं तो कर लीजिए। मेरा एक घंटा का तो एल्बम ही था, मैंने भी कहा ठीक है।
गाना बजा उनके जितने डांसर थे, सब स्टेज पर आ गए। मैं और मेरी टीम भी स्टेज पर पहुंची और हमें बारात स्टाइल का जितना डांस आता था, सब वहां दिखा दिया। मेरा वो एल्बम ऐसा बिका कि उस कंपनी ने अपने सारे एल्बम के प्रोडक्शन को रोककर, सिर्फ मेरा एल्बम निकालना शुरू कर दिया। उसकी डिमांड इतनी थी।
प्रोड्यूसर की माताजी की वजह से हीरो बनने का मौका मिला
‘निरहुआ सटल रहे’ काफी हिट रहा था। ये गाना पुरुष ही नहीं, महिलाओं की भी जुबान पर था। जब मनोज तिवारी भैया ने ‘सुसरा बड़ा पइसा वाला’ फिल्म की तो हमारे जैसे गायकों के लिए हीरो बनने का रास्ता खुला। भोजपुरी में पहली बार हुआ था कि कोई गायक हीरो बन गया और लोगों ने उसे खूब पसंद किया।
मनोज भैया बड़े स्टार बने और बैक टु बैक दो-तीन ब्लॉकबस्टर फिल्में भी दे दीं। फिल्मों के हिट होते ही उन्होंने अपनी फीस बढ़ा दी। उनकी एक फिल्म बनने वाली थी, लेकिन प्रोड्यूसर पैसे देने के लिए तैयार नहीं था। ऐसे में वो नया चेहरा ढूंढने लगे।
इसी दौरान वो प्रोड्यूसर अपने गांव सुल्तानपुर गए। घर में बैठे तो नई फिल्म का जिक्र किया और कहा कि मनोज को लेकर बनाने का सोच रहा था, लेकिन वो बहुत पैसा मांग रहे हैं। अब हम नया चेहरा ढूंढ रहे हैं। उनकी माता जी ने मेरा गाना ‘निरहुआ सटल रहे’ की सीडी दिखाई और कहा इसे ले लो। बहुत अच्छा लड़का है।
मैं उस वक्त बहुत साधारण और दुबला-पतला दिखता था। वो अपनी मां को कह नहीं पाए कि ये हीरो मटेरियल नहीं है। उन्होंने अपनी मां को कहा ठीक है माई और उनसे सीडी ले ली। घर से जब वो एयरपोर्ट जा रहे थे, तब उन्होंने मेरे गाने को सुना और फिर भूल गए।

फिर वो मुंबई आ गए और अपनी नई फिल्म पर काम करना शुरू कर दिया। मैं उनके दिमाग में कहीं भी नहीं था। एक दिन वो अपने ऑफिस में बैठे थे और गली से बारात गुजर रही थी। उस बारात में ‘निरहुआ सटल रहे’ गाना बज रहा था। उनके दिमाग में आया कि ये यहां भी पहुंच गया, यानी कि लोग इसको सुनते और देखते हैं। फिर मुझे उनके ऑफिस से कॉल आया। इस तरह साल 2006 में मेरी पहली फिल्म ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे’ आई।
मेरी फिल्म ने दिखाया कि रिक्शेवाला भी हीरो हो सकता है
पहली फिल्म के बाद मैंने दो-तीन और फिल्में कीं, लेकिन मजा नहीं आ रहा था। मुझे ऐसे ऑफर मिलने लगे, जिसमें छोटा या घिसा-पिटा रोल दे रहे थे। मैं इंतजार करने लगा कि मुझे कुछ ऐसा रोल मिले, जिसे मैं पूरी ईमानदारी से निभा पाऊं। मुझे जब ‘निरहुआ रिक्शावाला’ की स्क्रिप्ट मिली तो मैं खुश हो गया। इस रोल के लिए मुझे कुछ करना ही नहीं था। एक गरीब की कहानी है और मैं जन्म से ही गरीब हूं। गरीब घर में पैदा ही हुआ था। इस रोल के लिए मुझे कुछ एक्स्ट्रा नहीं करना था।
उस वक्त तक भोजपुरी में एक ही तरह की फिल्म बन रही थी। ऐसे में निर्माता-निर्देशक ने सोचा कि एक रिक्शेवाला भी हीरो हो सकता है। ये भोजपुरी की स्क्रीन पर पहली बार हो रहा था। फिल्म आई और लोगों ने जो प्यार दिया, वो अपने आप में एक अलग कहानी है। उस फिल्म को लेकर कुछ लोगों की ऐसी राय बनी कि एक रिक्शेवाला था, जो हीरो बन गया। इस तरह मेरे साथ निरहुआ नाम जुड़ गया। निरहुआ नाम इतना फेमस हुआ कि बाद में इस टाइटल से कई फिल्में बनीं।

एक समय निरहुआ नाम से चिढ़ने लगा था
मेरा दूसरे एल्बम का टाइटल ‘निरहुआ सटल रहे’ था। फिल्म ‘निरहुआ रिक्शावाला’ के बाद तो ये नाम मेरे से ऐसा चिपका कि मैं चिढ़ने लगा। शुरू में मुझे लगता कि मेरे मां-बाप ने इतना बढ़िया दिनेश लाल यादव नाम दिया है, फिर लोग क्यों मुझे निरहुआ नाम से बुला रहे हैं। मेरी चिढ़ ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे’ के दौरान मेरी को स्टार रहीं कल्पना पटवारी जी ने नोटिस किया था।
उन्होंने मुझे समझाया और कहा कि जो पहचान मिली है, उससे चिढ़ो मतो। आप जहां जा रहे हैं, वहां इतनी भीड़ आ रही है कि शूट रोकना पड़ रहा और लोग निरहुआ-निरहुआ चिल्ला रहे हैं। ये आपकी किस्मत है कि आपको ऐसा फेम मिला है। फिर आप ऐसे क्यों परेशान हो रहे हैं?
मुझे एहसास हुआ कि वो सही कह रही हैं। फिर मैंने धीरे-धीरे इस नाम को अपना लिया और नाम के साथ जोड़ ही लिया। मैंने दिनेश लाल यादव निरहुआ लिखना शुरू किया। जब मैं सांसद बना तो संसद में मेरी सीट पर भी यही नाम लिखा हुआ था।

एक्टिंग के लिए खुद को हर तरीके से झोंक दिया
मैं बचपन से ही फिल्मी आदमी था। ‘निरहुआ रिक्शावाला’ से जब लोगों का प्यार मिला तो मुझे जिम्मेदारी का एहसास हुआ। मुझे लगा कि मैंने बड़ी जिम्मेदारी ले ली है और इसे निभाने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी। मैंने डांस सीखने के लिए कोरियोग्राफर गणेश आचार्य की क्लास जॉइन कर ली। फाइट मास्टर के साथ मैंने फाइट की ट्रेनिंग ली। एक्टर बनने के लिए जो हो सकता था, मैंने वो सब कुछ सीखा।
उस वक्त तक मैं गायक के तौर पर अच्छा-खासा काम कर रहा था। एक स्टेज शो के लिए मैं लाखों में चार्ज करता था, लेकिन मैंने स्टेज बिल्कुल छोड़ दिया। मैंने तय किया कि अब तो एक्टिंग ही करूंगा।
एक्टिंग का सपना भी था और मैं ताक में था कि मुझे कुछ ऐसा मिले तो मैं उस दिशा में काम करूं। मैं पूरी ट्रेनिंग के साथ फिल्मों में काम करने लगा। मैं दिन भर शूटिंग करता, गाड़ी में सोता, फिर नई लोकेशन पर पहुंचकर पूरी रात शूट करता था। मैं कह सकता हूं कि मैंने खुद को पूरी तरह से झोंक दिया था।
अमिताभ बच्चन के साथ काम करके सपना पूरा हुआ
मैं पांच फिल्में लगातार सुपरहिट देकर भोजपुरी का जुबली स्टार बन चुका था। साल 2012 में वो पल आया, जब मेरा एक और सपना पूरा हुआ। मुझे अमिताभ बच्चन सर के साथ काम करने का मौका मिला। मैंने उन्हें बचपन से स्क्रीन पर देखा था। अमिताभ बच्चन मेरे लिए भगवान जैसे हैं। जब उनके साथ काम करने का मौका मिला और मैं पहले दिन सेट पर पहुंचा तो लगा भगवान को देख रहा हूं।

अमिताभ बच्चन और जया बच्चन के साथ निरहुआ की फिल्म ‘गंगा देवी’ साल 2012 में रिलीज हुई थी।
उनके सामने मैं पूरी तरह से ब्लैंक हो गया था। उन्होंने मेरी असहजता को भांप लिया था। इतने बड़े स्टार होने के बाद भी उन्होंने मेरी सहजता का ख्याल रखा। माहौल हल्का हो सके इसलिए वो जोक्स सुनाते थे। उनके अपनेपन की वजह से मैंने वो फिल्म कर ली, वरना उनके सामने एक्टिंग करना मुश्किल काम है।
योगी आदित्यनाथ जी की वजह से राजनीति में आया
मैं कभी राजनीति में आऊंगा, ये मैंने दूर-दूर तक नहीं सोचा था। मुझे आज भी राजनीति नहीं आती है। मुझे तो इतना पता होता था कि कोई नेता आया है, तो उसकी सभा में भीड़ जुटानी है। साल 2019 में जब मोदी जी के खिलाफ महागठबंधन बना, तब मुंबई में एक मीटिंग में मेरी मुलाकात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से हुई। उन्होंने मुझे लखनऊ मिलने बुलाया। मैं उस बात को भूल गया और मथुरा शूटिंग करने चल गया, लेकिन मुझे कॉल आया कि मुख्यमंत्री जी बुला रहे हैं।
मैं मिलने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हें चुनाव लड़ना है। मैंने उनसे भी कहा कि मुझे राजनीति के बारे में कुछ नहीं आता है। उन्होंने कहा कि तुम क्या चाहते हो? मैंने उन्हें बताया कि मोदी जी फिर से इस देश के प्रधानमंत्री बनें तो इस पर योगी जी ने कहा कि बस इतना काफी है। मैं आजमगढ़ जैसी मुश्किल सीट और अखिलेश यादव जैसे बड़े नेता के सामने चुनाव लड़ा और हार गया, लेकिन हारने के बाद भी मैंने अपनी जमीनी नहीं छोड़ी।

मैं लोगों के सुख-दुख में शामिल रहा। इसका नतीजा ये रहा कि जब साल 2022 में वहां उपचुनाव हुआ तो मैंने समाजवादी पार्टी के नेता धर्मेंद्र यादव को हरा दिया। कमाल की बात ये है कि मुझे राजनीति में लाने वाले यूपी के CM योगी जी है। आज मैं उनके ऊपर बनी फिल्म ‘अजेय द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ योगी’ से हिंदी इंडस्ट्री में कदम रख चुका हूं। मैं जल्द ही कई हिंदी फिल्म और वेब सीरीज में दिखूंगा और मुझे बहुत आनंद आ रहा है।
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