देश में पेपर लीक के बढ़ते मामलों और NEET विवाद के बीच सीनियर वकील एवं पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधारों की जरूरत बताई है। इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर इन चीफ रजत शर्मा से खास बातचीत करते हुए पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा कि पेपर लीक जैसे मामलों के लिए अलग और सख्त कानून बनाया जाना चाहिए। ऐसे अपराधों के लिए 5 से 10 साल तक की सजा, विशेष अदालत और जमानत के लिए कड़े प्रावधान होने चाहिए।
पेपर लीक करने वाले प्रभावशाली लोगों के जेल से बाहर आने और सजा से बच जाने के सवाल पर हरीश साल्वे ने कहा कि मौजूदा सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत ऐसे मामलों में आसानी से जमानत मिल जाती है। इसलिए परीक्षा से जुड़े अपराधों के लिए अलग से कानून बनाने की जरूरत है।
अलग-अलग माना जाना चाहिए अपराध
उन्होंने कहा कि पेपर लीक, पेपर लीक की साजिश और इसमें सहयोग करने को अलग-अलग अपराध माना जाना चाहिए। पेपर सेट करने वाले, शिक्षक, प्रिंटर, हैंडलर या किसी भी स्तर पर शामिल व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे मामलों की सुनवाई विशेष अदालतों में हो और अभियोजन पक्ष को सुने बिना जमानत न दी जाए।
सरकार से अलग स्वतंत्र निगरानी संस्था बनाने का सुझाव
हरीश साल्वे ने परीक्षा व्यवस्था की निगरानी के लिए सरकार से अलग एक स्वतंत्र ओवरसाइट बॉडी बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यह संस्था पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग, परीक्षा केंद्रों, निगरानी, मूल्यांकन और मार्किंग तक पूरी प्रक्रिया की निगरानी करे, ताकि परीक्षा प्रणाली की गोपनीयता और निष्पक्षता बनी रहे।
उन्होंने कोचिंग संस्थानों को भी नियमन के दायरे में लाने की बात कही। उनके मुताबिक, कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण, नियमित ऑडिट और उनकी फीस व संचालन से जुड़ी जानकारी में पारदर्शिता होनी चाहिए। पेपर लीक में किसी कोचिंग संस्थान की भूमिका सामने आने पर उसके खिलाफ भी कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए।
अलग और प्रभावी कानून भी जरूरी
पेपर लीक मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजे जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसका फायदा यह होगा कि लंबे समय से लंबित आपराधिक मामलों का निपटारा सालों के बजाय कुछ महीनों में किया जा सकेगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि तेज सुनवाई के साथ-साथ ऐसे मामलों के लिए अलग और प्रभावी कानून भी जरूरी है।
कानून बनने तक अध्यादेश का रास्ता अपनाने का सुझाव
संसद में राजनीतिक गतिरोध के कारण कानून नहीं बन पाने के सवाल पर हरीश साल्वे ने कहा कि सरकार अध्यादेश का रास्ता अपना सकती है। उन्होंने कहा कि पेपर लीक का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि छात्रों और देश के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। सरकार अध्यादेश लाकर संसद को छह महीने के भीतर इस पर बहस कर कानून बनाने का अवसर दे सकती है।
NEET जैसे परीक्षा मॉडल पर भी उठाए सवाल
अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों में स्कूल प्रदर्शन और मूल्यांकन के आधार पर दाखिले की व्यवस्था का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में यह मॉडल लागू करना आसान नहीं है। देश में अलग-अलग राज्यों के स्कूल बोर्ड और शिक्षा के स्तर में काफी अंतर है। ऐसे में केवल स्कूल के अंकों के आधार पर पूरे देश में दाखिला देना समान अवसर की गारंटी नहीं दे सकता।
उन्होंने कहा कि भारत में छात्रों की संख्या बहुत अधिक और संस्थानों की संख्या सीमित है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की जरूरत बनी रहती है, लेकिन उसकी व्यवस्था को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना जरूरी है।
छात्रों का भरोसा नहीं टूटना चाहिए
छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर हरीश साल्वे ने कहा कि सरकार को छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति को अलग रखते हुए सरकार को छात्रों से सीधे संवाद करना चाहिए और पेपर लीक मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।
उन्होंने छात्रों से भी शांत रहने की अपील करते हुए कहा कि सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए और छात्रों को यह भरोसा दिलाना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। उनके मुताबिक, पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून, स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था और तेज न्यायिक प्रक्रिया ही छात्रों का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा बहाल कर सकती है।
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