राजस्थान के नगर निगमों और नगर पालिकाओं के मेयर और चेयरमैन के चुनाव में बीजेपी ने बाज़ी मार ली। चुनाव में बहुमत का गणित कई जगह धरा का धरा रह गया। कई पार्टियों के अपने ही खेमे के वोट खिसके, तो कहीं निर्दलियों ने पाला बदला। दस नगर निगमों में से सात के नतीजे आए, जिनमें छह पर बीजेपी ने क़ब्ज़ा किया। 47 नगर परिषदों में से 31 पर बीजेपी के उम्मीदवार जीते। 252 नगर पालिकाओं में से 162 में बीजेपी अपना चेयरमैन बनवाने में कामयाब रही। 303 निकायों के परिणाम घोषित हुए, जिनमें भाजपा ने 198 और कांग्रेस ने 95 निकायों में अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की।
अजमेर में कांग्रेस को मेयर बनने की पूरी उम्मीद थी, निर्दलियों को बेंगलुरु घुमाया-फिराया, फाइव स्टार होटल में ठहराया और निर्दलियों ने लौट कर बीजेपी को वोट दे दिया। मेयर बीजेपी का बन गया। तीन जगहों पर तो बीजेपी और कांग्रेस का मुकाबला टाई रहा। दोनों के उम्मीदवार को बराबर वोट मिले लेकिन भाग्य भी बीजेपी के साथ था। तीनों जगह पर्ची निकाल कर मेयर का फैसला हुआ। तीनों जगह बीजेपी के उम्मीदवार के नाम की पर्ची निकली।
राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष मदन राठौड़ ने इस जीत का श्रेय मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को दिया। कहा, उन्होंने ही पूरी रणनीति बनाई, उसका नतीजा सबके सामने है। कांग्रेस के खेमे में मायूसी है। राजस्थान के कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद डोटासरा ने कहा कि कांग्रेस जनता की अदालत में जीती है, बीजेपी ने सत्ता की ताकत और पैसे के बल पर चुनाव जीता,कांग्रेस के पार्षदों को धमकाया।
राजस्थान में मेयर के चुनाव इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए? मुख्यमंत्री ने स्थानीय निकायों के चुनाव जीतने के लिए इतनी जान क्यों लगाई? इसकी वजह समझने की ज़रूरत है। भजन लाल शर्मा को कमज़ोर मुख्यमंत्री बताया जा रहा था। उनकी अपनी पार्टी के लोग दिल्ली आकर कहते थे कि अगर वो CM बने रहे, तो बीजेपी के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।
ये सही है कि भजन लाल शर्मा मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन उनके पास सरकार चलाने का अनुभव नहीं था, पर संगठन के वो पुराने खिलाड़ी हैं। निकाय चुनाव में उन्होंने अपनी संगठन चलाने की क्षमता का पूरा इस्तेमाल किया। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने कोशिश नहीं की। कांग्रेस ने अपने पार्षदों को बचाए रखने की जी-तोड़ कोशिश की लेकिन भजन लाल शर्मा के सामने ये कोशिश कम पड़ गई। भजन लाल शर्मा ने अपनी कुर्सी तो पक्की कर ली है, ज़्यादातर जगहों पर बीजेपी के मेयर भी बनवा लिए, लेकिन इस चुनाव का एक संदेश ये भी है कि राजस्थान में कांग्रेस कमज़ोर नहीं है। भजन लाल शर्मा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। उन्हें अच्छी सरकार चलाकर दिखाना होगा। काम करके लोगों का विश्वास जीतना होगा।
उत्तर प्रदेश : जातियों की सियासत तेज़
बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में औपचारिक तौर पर चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। योगी आदित्यनाथ ने पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ मेरठ में आयोजित सम्मेलन में कार्यकर्ताओं से कहा कि जात-पात में नहीं बंटना है, एकजुट रहना है, काम के आधार पर चुनाव लड़ना है। योगी ने कहा, विरोधी दल नये नये झूठे नैरेटिव सेट कर जनता को मायाजाल में फंसाने की कोशिश करते हैं। उधर AIMIM चीफ असदुद्दीन औवैसी यूपी पहुंच गए। कहा, विपक्ष का वोट न बंटे, इसके लिए वह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से हाथ मिलाने को तैयार हैं लेकिन समझौता बराबरी का होना चाहिए।
ओवैसी ने अखिलेश यादव को अलायंस का ऑफर दिया, लेकिन अखिलेश ने इस ऑफर को खारिज कर दिया। अखिलेश ने कहा कि यूपी में गठबंधन का स्वरूप नहीं बदलेगा। इसका मतलब ये हुआ कि सपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन वही रहेगा, ओवैसी के लिए इसमें जगह नहीं हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि अगर गठबंधन होना है तो सीटों के बंटवारे में देरी क्यों हो रही है? सीट बंटवारे में जितनी देर होगी, बीजेपी को उतना ज्यादा फायदा होगा।
अखिलेश यादव भले ही ओवैसी को भाव न दे रहे हों लेकिन ओवैसी की रणनीति बिल्कुल साफ है। ओवैसी का फोकस उन इलाकों में हैं, जहां मुस्लिम आबादी चुनाव नतीजों पर असर डालती है। ओवैसी को सपा और कांग्रेस के नेता “बीजेपी की B-टीम” कहते हैं। वो खुलेआम दावा करते हैं कि ओवैसी वोट काटते हैं, बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाते हैं। इसी का counter ओवैसी ने किया। उन्होंने अखिलेश यादव को alliance का ऑफर दिया। बिहार में भी ओवैसी ने तेजस्वी यादव से यही कहा था। तेजस्वी को ओवैसी के साथ गठबंधन न करने का नुक़सान हुआ। अब अखिलेश के सामने यही चुनौती है।
उधर, ओमप्रकाश राजभर ने नया शिगूफा छोड़ दिया। उन्होंने अपनी जाति के लोगों को उनकी ताकत का एहसास कराया। राजभर ने कहा कि आज नहीं तो कल यूपी का बंटवारा होगा और जब होगा तब पूर्वांचल का मुख्यमंत्री राजभर का बेटा ही बनेगा। राजभर आजकल अखिलेश यादव पर रोज अटैक करते हैं। अखिलेश ने पलटवार किया, कहा कि राजभर अपने आकाओं के कहने पर जनता को बहकाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यूपी को बांटने का ख्वाब कभी पूरा नहीं होगा।
सब जानते हैं कि यूपी के चुनाव में जातियों का असर होता है। वोटों का बंटवारा जातियों के आधार पर होता है। इसलिए सभी पार्टियां अपनी अपनी रणनीति के हिसाब से जाति की सियासत कर रही हैं। ओवैसी की नज़र मुस्लिम वोटों पर हैं। ओमप्रकाश राजभर अपनी जाति के वोटों को एकजुट रखना चाहते हैं। संजय निषाद, मल्लाहों के वोटों के लिए मंत्री होने के बावजूद सरकार के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गए। अखिलेश यादव की नज़र यादव और मुस्लिम वोटों के अलावा दलितों के 21 परसेंट वोटों पर है। इसीलिए अखिलेश ने PDA का नारा दिया, छात्र सभा की uniform नीली की, अपना गमछा नीला किया। मायावती कई बरस तक दलित समाज की प्रभावी नेता रही हैं लेकिन पिछले कई दिन से वह सिर्फ़ अपने परिवार को लेकर ट्वीट करती हैं, कभी किसी को हटाती हैं, कभी किसी को बनाती हैं। बीजेपी को इसमें अवसर दिखाई दिया। इसीलिए 2024 में हुए दलित वोट के नुक़सान की भरपाई करने के लिए बीजेपी ने भी ताक़त लगाई है। जैसे जैसे चुनाव क़रीब आएंगे, यूपी में जाति की सियासत और तेज़ होगी।
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