40 मिनट पहलेलेखक: अभय पांडेय
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संजय दत्त अब तक 2026 में ‘धुरंधर 2’, ‘द राजा साहब’, ‘आखिरी सवाल’, ‘राजा शिवाजी’, ‘केडी – द डेविल’ और ‘7 डॉग्स’ फिल्मों में नजर आ चुके हैं।
साल था 1994। मुंबई की ठाणे सेंट्रल जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में बंद एक आरोपी रक्षाबंधन के दिन अपनी बहनों का इंतजार कर रहा था। लोहे की सलाखों के पीछे दोनों बहनों ने उसके हाथ पर राखी बांधी, लेकिन उस भाई की जेब पूरी तरह खाली थी। देने के लिए न कोई तोहफा था, न पैसे।
कुछ पल तक वह चुप रहा। फिर जेल की कैंटीन से मिले दो-दो रुपए के चाय-नाश्ते के कूपन बहनों के हाथ में रख दिए और बोला, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’
यह वही शख्स था, जिसके नाम पर कभी सिनेमाघरों के बाहर भीड़ उमड़ती थी, जिसकी फिल्मों के पोस्टर शहरों में छाए रहते थे और जो करोड़ों लोगों का सुपरस्टार था, लेकिन वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वही एक्टर जेल की चारदीवारी के भीतर अपनी बहनों को सिर्फ दो रुपए के कूपन ही दे सका।
जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के ‘संजू बाबा’ यानी संजय दत्त की। आज उनके 67वें जन्मदिन पर जानते हैं उनके कुछ अनसुने किस्से।
इंदिरा गांधी की सलाह पर बोर्डिंग स्कूल भेजा गया
संजय दत्त के जन्म के बाद सुनील दत्त और नरगिस ने अपने बेटे के नाम के लिए फिल्म पत्रिका ‘शमा’ के पाठकों से सुझाव मांगे थे। जिसके बाद देशभर से लगभग 15,000 से अधिक नाम आए थे। इसके बाद ‘संजय’ नाम आगरा की रहने वाली पुष्पा अग्रवाल ने सुझाया था।
संजय बचपन से ही परिवार के सबसे लाड़ले थे। माता-पिता, नानी और रिश्तेदार उनकी हर इच्छा पूरी कर देते थे। इसी वजह से वे बेहद जिद्दी भी होते जा रहे थे। स्कूल हो या घर, हर जगह उन्हें विशेष तवज्जो मिलती थी। हालांकि, संजय सिर्फ जिद्दी नहीं थे, उनका दिल भी बहुत बड़ा था। एक बार दिल्ली में एक शादी के दौरान उन्होंने ठंड से कांप रहे एक गरीब बच्चे को अपना सूट उतारकर दे दिया था।

माता-पिता के साथ संजय दत्त की बचपन की तस्वीर। (AI की मदद से तस्वीर की क्वालिटी बेहतर की गई है।)
लेकिन उनकी शरारतें परिवार की चिंता भी बढ़ा रही थीं। पत्रकार यासिर उस्मान द्वारा संजय दत्त पर लिखी गई किताब के मुताबिक छह साल की उम्र में उन्होंने पिता सुनील दत्त को सिगरेट पीते देखा और खुद भी सिगरेट पीने की जिद करने लगे।
सुनील दत्त को लगा कि एक बार सिगरेट पीने के बाद बेटे का शौक खत्म हो जाएगा, लेकिन संजय ने पूरी सिगरेट पी ली। कुछ साल बाद वे घर आए मेहमानों की फेंकी हुई सिगरेट की बुझी हुई बटें बगीचे में छिपकर पीते हुए भी पकड़े गए। जिस पर पिता ने उनकी पिटाई की थी।
ऐसे में सुनील दत्त को एहसास हुआ कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और फिल्मी माहौल का संजय पर गलत असर पड़ रहा है। तभी यह फैसला किया गया कि संजय को किसी बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाए। इसके बाद परिवार की करीबी मित्र और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सलाह दी कि संजय को मिलिट्री डिसिप्लिन के लिए हिमाचल प्रदेश के सनावर स्थित लॉरेंस स्कूल भेजा जाए।

1980 में इंदिरा गांधी सरकार ने नरगिस दत्त को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था। वहीं, सुनील दत्त कांग्रेस के टिकट पर पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए थे।
संजय जूतों में हेरोइन छिपाकर न्यूयॉर्क गए थे
1980 में संजय दत्त अपनी पहली फिल्म ‘रॉकी’ की शूटिंग में बिजी थे। इसी दौरान उनकी मां नरगिस की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। नरगिस को पैंक्रियाटिक कैंसर था और उन्हें इलाज के लिए न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ले जाना था।
सुनील दत्त ने कांपती आवाज में अपने तीनों बच्चों संजय, नम्रता और प्रिया को बताया कि उनकी मां को कैंसर है। इसके बाद ‘रॉकी’ की शूटिंग रोक दी गई और 21 अगस्त 1980 को सुनील दत्त नरगिस को लेकर अमेरिका रवाना हो गए।
न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान नरगिस की कई सर्जरी हुईं, लेकिन ऑपरेशन के बाद लगातार खून बहने से वे कोमा में चली गईं। इसी दौरान संजय दत्त खुद भी नशे की लत से जूझ रहे थे। मां की गंभीर हालत के बावजूद वे ड्रग्स नहीं छोड़ पा रहे थे।
यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, न्यूयॉर्क जाते समय वे अपने जूतों में करीब 30 ग्राम हेरोइन छिपाकर ले गए थे। बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि उस घटना को याद करके उन्हें शर्म आती है। यहां तक कि नशे की वजह से उन्हें अपनी मां के लिए खून दान करने की अनुमति भी नहीं मिली थी।

‘रॉकी’ के प्रीमियर में नरगिस की याद में कुर्सी खाली छोड़ी गई
न्यूयॉर्क में करीब तीन महीने तक कोमा में रहने के बाद नरगिस को होश आया था। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वे जल्द भारत लौटें और अपने बेटे की पहली फिल्म ‘रॉकी’ देखें।
6 मार्च 1981 को भारत लौटने के बाद 9 मार्च 1981 को सुनील दत्त उन्हें फिल्म ‘रॉकी’ दिखाने घर के प्रीव्यू थिएटर तक ले गए। कमजोरी के कारण वे पूरी फिल्म नहीं देख सकीं और सिर्फ सात रील देखने के बाद उन्हें वापस कमरे में ले जाना पड़ा, लेकिन जितना देखा, उससे वे बेहद खुश थीं। उन्हें विश्वास था कि उनका बेटा संजू बड़ा स्टार बनेगा।
वहीं, संजय की डेब्यू फिल्म ‘रॉकी’ का प्रीमियर 7 मई 1981 को तय किया गया था। प्रीमियर से ठीक चार दिन पहले, 3 मई 1981 को नरगिस का निधन हो गया। इसके बाद फिल्म के प्रीमियर के दौरान सुनील दत्त ने थिएटर में संजय दत्त के बगल वाली कुर्सी नरगिस की याद में खाली रखी थी।
ऋषि कपूर-राजेश खन्ना को पीटने पहुंच गए थे
फिल्म ‘रॉकी’ की शूटिंग के दौरान संजय दत्त और एक्ट्रेस टीना मुनीम के बीच प्यार हुआ। इस रिश्ते में संजय बेहद पजेसिव बॉयफ्रेंड थे। दोनो का अफेयर लगभग 2 साल तक चला था।
यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, फिल्म ‘कर्ज’ में टीना मुनीम ऋषि कपूर के साथ काम कर रही थीं। तब दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की अफवाहें फैल गई थीं। इससे संजय इतने गुस्से में आ गए कि वे ऋषि कपूर की पिटाई करने के इरादे से उनके घर पहुंच गए थे।

संजय दत्त और एक्ट्रेस टीना मुनीम ने फिल्म ‘रॉकी’ में काम किया था।
संजय ने एक्टर गुलशन ग्रोवर से भी अपने साथ चलने को कहा। गुलशन ने बाद में बताया था,
संजय और मैं भाइयों जैसे थे। एक दिन उसने मुझसे कहा, ‘चलो चिंटू (ऋषि कपूर) के घर चलते हैं, उसकी पिटाई करनी है।’ हम वहां गए भी, लेकिन उनकी मंगेतर नीतूजी (नीतू सिंह) ने हमें समझाया कि चिंटू का कोई अफेयर नहीं है। इसके बाद हम वहां से लौट आए।

बाद में फिल्म ‘सौतन’ की शूटिंग के बाद टीना मुनीम और राजेश खन्ना की नजदीकियों की खबरें फिल्म इंडस्ट्री में फैलने लगीं। बाद में संजय ने स्वीकार किया कि उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि टीना उन्हें छोड़कर किसी और के करीब चली जाएं। इसके बाद गुस्से में वे सीधे मेहबूब स्टूडियो पहुंच गए, जहां राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे।
संजय ने राजेश खन्ना के ठीक सामने कुर्सी खींचकर लगा ली और उन्हें लगातार घूरते रहे। बाद में खुद संजय ने स्वीकार किया कि अगर उस दिन राजेश खन्ना ने कुछ भी कहा होता, तो वे उन पर हमला कर देते, लेकिन राजेश खन्ना शांत बैठे रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार संजय वहां से लौट आए।
संजय दत्त और रेखा की गुपचुप शादी की अफवाह उड़ी थी
साल 1982 में अफवाह फैल गई कि संजय दत्त ने एक्ट्रेस रेखा से गुपचुप शादी कर ली। दरअसल, मशहूर फिल्म मैगजीन सिनेब्लिट्ज ने अपने कॉलम ‘रिप ऑफ’ में लिखा था,
हमें अपने बेहद भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है, जो होटल सी रॉक के आसपास मौजूद थे, कि संजय और रेखा ने अपनी कथित शादी के शुरुआती कुछ दिन वहीं साथ बिताए। अगर आप सोच रहे हैं कि होटल में किसी ने उन्हें क्यों नहीं देखा, तो याद रखिए कि वहां ‘रूम सर्विस’ जैसी सुविधा भी होती है।

मैगजीन ने आगे लिखा था,
संजय दत्त इन दिनों खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। उनकी अपनी ‘कवयित्री’ रेखा उनके लिए छोटी-छोटी प्रेम कविताएं लिख रही हैं, ‘तुम मेरी ताकत हो, मेरा सहारा हो, मेरे प्यारे से फूल हो।’

यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, इन खबरों से फिल्म इंडस्ट्री में सनसनी फैल गई। हालांकि, संजय दत्त और रेखा दोनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। एक इंटरव्यू में संजय ने साफ कहा था कि रेखा से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। मेरी शादी की खबर पूरी तरह साजिश और झूठ है। यहां तक कि मेरी तथाकथित गुप्त शादी की कहानी भी गढ़ दी गई।

संजय दत्त और रेखा ने 1984 की फिल्म जमीन आसमान में मुख्य रूप से काम किया था।
संजय ने कहा था कि कुछ रिपोर्टों में तो यह तक लिखा गया कि शादी के 15 दिन बाद वे रेखा को अपने पिता सुनील दत्त से आशीर्वाद दिलाने ले गए, लेकिन सुनील दत्त ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया।
संजय ने इन सभी दावों को मनगढ़ंत बताते हुए कहा था कि उन्होंने कभी रेखा से शादी नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि उनका नाम रेखा के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है, जबकि वे जानते हैं कि रेखा का रिश्ता फिल्म इंडस्ट्री के एक बड़े शख्स से है।
संजय का मानना था कि यह अफवाह इसलिए भी फैली क्योंकि वे उस समय अस्पताल में भर्ती अमिताभ बच्चन से मिलने नहीं जा सके थे।

जेल में बहनों को दो-दो रुपए के कूपन दिए थे
साल था 1994 और महीना था जुलाई। अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में संजय दत्त की अंतरिम जमानत अदालत ने रद्द कर दी और उन्हें ठाणे सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में रखा गया। यह वही जगह थी, जहां खतरनाक अपराधियों और टाडा के आरोपियों को रखा जाता था।
करीब 10×10 फीट की उस छोटी-सी कोठरी में न धूप आती थी और न ही बाहर की दुनिया दिखाई देती थी। एक छोटा-सा बल्ब, एक गद्दा और कोने में बिना फ्लश वाला शौचालय।
संजय दत्त ने बाद में बताया था कि शुरुआती डेढ़ महीने तक उन्हें दूसरे कैदियों से मिलने तक की इजाजत नहीं थी। अकेलापन इतना बढ़ गया कि उन्होंने समय काटने के लिए चींटियों को घंटों चलते हुए देखना शुरू कर दिया था।
बाहर पिता सुनील दत्त लगातार बेटे की जमानत के लिए नेताओं, वकीलों और अधिकारियों के चक्कर लगा रहे थे। बहनें प्रिया और नम्रता भी नियमित रूप से जेल जाती थीं, लेकिन अक्सर सिर्फ दूर से ही संजय को देख पाती थीं।
वहीं, रक्षाबंधन पर बहनों ने जेल में उन्हें राखी बांधी। उस समय संजय के पास देने के लिए कोई गिप्ट नहीं था। उन्होंने अपनी बहनों को सिर्फ जेल की कैंटीन के दो-दो रुपए वाले चाय-नाश्ते के कूपन दिए और कहा था, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’

बहन प्रिया दत्त (बाईं ओर) और नम्रता दत्त (दाईं ओर) के साथ संजय दत्त की पुरानी तस्वीर।
बेटी के एक्टिंग करने पर बोले थे- टांगें तोड़ दूंगा
संजय दत्त की बड़ी बेटी त्रिशाला दत्त का जन्म 1988 में उनकी पहली पत्नी रिचा शर्मा से हुआ था। जब वह सिर्फ 8 साल की थीं, तब ब्रेन ट्यूमर के कारण उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण न्यूयॉर्क में नाना-नानी ने किया। त्रिशाला कभी बॉलीवुड में अभिनेत्री बनना चाहती थीं, लेकिन संजय दत्त इसके सख्त खिलाफ थे।
2016 में फिल्म ‘भूमि’ के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा था, ‘त्रिशाला एक्ट्रेस बनना चाहती थी और मैं उसकी टांगें तोड़ देना चाहता था।’
संजय दत्त ने यह भी कहा था, ‘मैंने उसे एक अच्छे कॉलेज में भेजने के लिए अपना बहुत समय और एनर्जी लगाई है। उसने फोरेंसिक साइंस में विशेषज्ञता हासिल की है और मुझे लगता है कि यह एक बेहतरीन करियर है।’

त्रिशाला दत्त का जन्म 10 अगस्त 1988 को हुआ था।

सलमान की BMW की चाबी समुद्र में फेंक दी थी
संजय दत्त और सलमान खान की दोस्ती बॉलीवुड में मिसाल मानी जाती है। हालांकि, एक बार ऐसा भी हुआ था जब संजय दत्त, सलमान से नाराज हो गए थे। इस किस्से का खुलासा खुद सलमान ने रजत शर्मा के शो में किया था।
सलमान ने बताया था कि सोहेल खान की फिल्म ‘मैंने दिल तुझको दिया’ में संजय दत्त ने दोस्ती की खातिर गेस्ट अपीयरेंस किया था। शूटिंग पूरी होने के बाद संजय दत्त सलमान के घर पहुंचे, जहां पार्टी चल रही थी। उसी दौरान सलमान के पास नई BMW M5 आई थी। वह संजय दत्त को बाहर ले गए और बोले, ‘बाबा, यह देश की पहली BMW M5 है और मैं चाहता हूं कि यह आपके पास हो।’
इतना सुनते ही संजय दत्त ने सलमान को धन्यवाद कहा, लेकिन अगले ही पल कार की चाबी उठाकर सीधे समुद्र में फेंक दी। चाबी समंदर में चली गई और क्योंकि कार की केवल एक ही चाबी थी, इसलिए वह कई दिनों तक घर के बाहर ही खड़ी रह गई। सलमान ने बताया था कि उस चाबी को ढूंढ़कर निकालने में पूरे चार दिन लगे थे।

संजय दत्त और सलमान खान ने मुख्य रूप से फिल्म ‘साजन’ (1991) और ‘चल मेरे भाई’ (2000) में साथ काम किया है।

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