महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर देश की राजनीति में तेज हलचल दिखाई दे रही है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय यह बन गया है कि क्या इस मुद्दे पर विपक्षी दल एकजुट रह पाएंगे या फिर अधिकांश पार्टियां एनडीए का साथ देने की राह पर हैं। हाल की राजनीतिक गतिविधियों और नेताओं के बयानों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। इन्हीं मामलों को लेकर ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ कार्यक्रम में चर्चा की गई। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
सुप्रिया सुले के बयान पर क्या है मायने
कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा शरद पवार की पार्टी को लेकर हुई। दरअसल, सुप्रिया सुले के बयान के बाद यह संकेत मिला है कि डीलिमिटेशन बिल में यदि सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का प्रावधान आता है तो उनकी पार्टी इस पर सकारात्मक रुख अपना सकती है। यही वजह है कि विपक्षी एकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। माना जा रहा है कि कई क्षेत्रीय दलों के सामने भी अपने राजनीतिक भविष्य और विकास कार्यों के लिए केंद्र के साथ तालमेल बनाए रखने की मजबूरी है।
चर्चा के दौरान कई अहम राजनीतिक मुलाकातों का भी जिक्र हुआ। योगी आदित्यनाथ और अमित शाह की बैठक, देवेंद्र फडणवीस की एनसीपी नेताओं से मुलाकात, सुप्रिया सुले और योगी आदित्यनाथ की मुलाकात और अन्य नेताओं की गतिविधियों को बड़े राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा जा रहा है। इन बैठकों को आगामी संसद सत्र और संभावित राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
शरद पवार गुट के ज्यादातर नेता सत्ता के साथ आने के पक्ष में
विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र में एनसीपी के भीतर भी बड़ी संख्या में नेता सत्ता के साथ आने के पक्ष में हैं। उनका तर्क है कि सरकार के साथ रहने से विकास योजनाओं, प्रशासनिक सहयोग और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखना आसान होगा। हालांकि अंतिम फैसला अभी भी भाजपा और शरद पवार के रुख पर निर्भर माना जा रहा है।
चर्चा में यह भी कहा गया कि अगर अधिकांश क्षेत्रीय दल महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन जैसे मुद्दों पर समर्थन देते हैं तो कांग्रेस अकेली पड़ सकती है। समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आरजेडी और अन्य दलों पर भी अपने-अपने राज्यों के राजनीतिक हितों को देखते हुए दबाव बढ़ सकता है। खासकर उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना को देखते हुए विरोध करना राजनीतिक रूप से आसान नहीं माना जा रहा।
कार्यक्रम में पीएम मोदी और अमित शाह के पुराने बयानों पर जिक्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के पुराने बयानों का भी जिक्र हुआ, जिनमें महिला आरक्षण के रास्ते की सभी बाधाओं को दूर करने की बात कही गई थी। अब यह चर्चा हो रही है कि यदि संसद में पर्याप्त समर्थन जुट जाता है तो महिला आरक्षण, डीलिमिटेशन और वन नेशन वन इलेक्शन जैसे बड़े मुद्दों पर सरकार तेजी से आगे बढ़ सकती है।
पूरी चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि आने वाला संसद सत्र भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। यदि विपक्ष के कई सहयोगी दल अलग रुख अपनाते हैं, तो कांग्रेस और राहुल गांधी खुद को राजनीतिक रूप से अलग-थलग स्थिति में पा सकते हैं। दूसरी ओर, यदि सरकार अपने पक्ष में पर्याप्त समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव की शुरुआत मानी जाएगी।
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