ED ने भारत के घरेलू मामलों में कथित तौर पर हस्तक्षेप करने और संदिग्ध विदेशी फंडिंग को लेकर दो विदेशी संस्थाओं के खिलाफ जांच शुरू की है। जांच के दायरे में करीब 15 लाख अमेरिकी डॉलर यानी करीब 14.1 करोड़ रुपये के संदिग्ध ट्रांजैक्शन आए हैं। ED को शक है कि यह पैसा कई देशों के रास्ते घुमाकर भारत में मौजूद कुछ संस्थाओं और व्यक्तियों तक पहुंचाया गया।
फंडिंग को कई लेयर में छिपाने की कोशिश हुई
जांच में सेंट किट्स एंड नेविस में रजिस्टर्ड कंपनी TCC Digital Markets Ltd को 10 लाख डॉलर के फंड का सोर्स पाया गया है। जर्मनी के Dr Matthias Karl Vogt Trust को इस 10 लाख डॉलर का वास्तविक सोर्स बताया गया है। जांच एजेंसी के मुताबिक, जर्मन ट्रस्ट ने पहले यह रकम लिथुआनिया की कंपनी XBase Digital UAB को ट्रांसफर की, ताकि जर्मन कानूनों से बचा जा सके।
भारत तक यूं पहुंची विदेशी फंडिंग
ED को शक है कि इस फंडिंग में हवाला के जरिए दुबई और लिथुआनिया के रास्ते डिजिटल एसेट्स का इस्तेमाल किया गया। जांच में सामने आया कि सेंट किट्स एंड नेविस की कंपनी ने इस रकम को ग्रांट के तौर पर दो किस्तों में ब्रिटिश कंपनी को ट्रांसफर किया। ED को कनाडा में रजिस्टर्ड एक अन्य कंपनी ZBase Digital Inc के जरिए भी 5 लाख डॉलर ट्रांसफर किए जाने का पता चला है। यह रकम फरवरी 2026 में उसी ब्रिटिश कंपनी के अकाउंट में भेजी गई। दोनों संदिग्ध ट्रांजैक्शन की कुल रकम 15 लाख डॉलर है। भारतीय एजेंसियां इन ट्रांजैक्शन की जानकारी Airwallex से सत्यापित कर रही हैं।
विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार सख्त
गौरतलब है कि विदेशी फंडिंग पाने का इरादा रखने वाले NGO पर भी सरकार सख्त है। इसी साल, सरकार ने NGOs के लिए FCRA नियम सख्त किए थे। विदेशी फंडिंग के नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने में संशोधन किया था। सरकार ने FCRA नियम 2011 में कई अहम बदलाव किए हैं। अब NGO और अन्य संगठनों को विदेशी फंडिंग लेने और उसका प्रयोग करने में ज्यादा जवाबदेही और सख्ती बरतनी होती है। विदेशी फंडिंग के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाले NGO को अब साफ-साफ बताना होगा कि वे किस उद्देश्य से काम करेंगे और किन-किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में काम करेंगे।
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