
साल 1947 में भारत से अलग होकर एक नया देश पाकिस्तान बना। तब भारत और पाकिस्तान की मुद्राएं एक समान थीं। यानी 1 भारतीय रुपया = 1 पाकिस्तानी रुपया था। तब किसी ने शायद ही सोचा होगा कि समय के साथ दोनों मुद्राओं का यह संतुलन इतनी तेजी से और इतने बड़े अंतर के साथ बिगड़ जाएगा। दरअसल आज दोनों देशों की मुद्राओं में काफी अंतर आ चुका है। आज स्थिति बिल्कुल अलग है। 1 भारतीय रुपया की कीमत लगभग 3.22 पाकिस्तानी रुपये के बराबर हो गई है।
लेकिन ऐसा कैसे हुआ?
क्या आपने कभी सोचा है कि किसी जमाने में भारत और पाकिस्तान की करेंसी एक जैसी होते हुए भी आज इतनी अलग कैसे हो गई? क्या फैसले, संकट और हालात थे, जिन्होंने दोनों देशों की आर्थिक दिशा को बिल्कुल अलग मोड़ दे दिया? यह सिर्फ मुद्रा या विनिमय दर की बात नहीं है, बल्कि यह इतिहास, नीतियों और लोगों की सोच का नतीजा है। इसे समझने के लिए थोड़ा अतीत में चलते हैं। laxmiiforex के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान की मुद्रा प्रणाली की नींव ब्रिटिश इंडियन करेंसी सिस्टम पर आधारित थी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने अपना खुद का पैसा तुरंत जारी नहीं किया था।
आजादी के शुरुआती कुछ महीनों तक पाकिस्तान ने भारतीय मुद्रा का ही इस्तेमाल किया, जिस पर Government of Pakistan की मुहर लगाई जाती थी। कुछ समय बाद, पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से अपनी खुद की मुद्रा पाकिस्तानी रुपया यानी PKR पेश किया। यह कदम पाकिस्तान के लिए अपनी आर्थिक पहचान स्थापित करने की दिशा में पहला बड़ा बदलाव था। लेकिन यहीं से दोनों देशों की आर्थिक राहें अलग-अलग होनी शुरू हो गईं।
भारतीय रुपये के सामने पाकिस्तानी रुपया क्यों होता गया कमजोर
दोनों देशों के आर्थिक रास्ते हो गए अलग
1947 के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों के सामने बड़े सपने थे, लेकिन उन्हें पाने के तरीके काफी अलग थे। भारत ने कृषि से लेकर भारी उद्योग और आगे चलकर आईटी और सर्विस सेक्टर तक एक विविध अर्थव्यवस्था बनाने पर जोर दिया। साल 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने वैश्विक बाजार के लिए अपने दरवाजे खोले, विदेशी निवेश को आकर्षित किया और निर्यात को मजबूत किया। इन प्रयासों से भारतीय रुपये की स्थिति मजबूत होती चली गई।
पाकिस्तान में बंटवारे के बाद से ही राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार सरकार बदलने जैसी समस्याएं खड़ी होती रहीं। इसके चलते वहां कोई लंबी अवधि की कोई आर्थिक नीति नहीं बन पाई। उद्योगों को बढ़ावा नहीं मिल सका, पाकिस्तान ने अक्सर विदेशी मदद और कर्ज़ पर निर्भर रहना शुरू कर दिया जिसने अर्थव्यवस्था को लंबे समय में और कमजोर बना दिया।
कर्ज के जाल में फंसता गया पाकिस्तान
भारत और पाकिस्तान की मु्द्राओं में दूरी बढ़ने की एक सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान का लगातार कर्ज लेने का रवैया रहा। पाकिस्तान ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज लिया ताकि आर्थिक संकट से निपट सके। लेकिन आप जानते हैं कर्ज आगे बढ़ने में राह में रोड़ा साबित होता है, क्योंकि आपको ब्याज भी चुकाना होता है। पाकिस्तान वही करता चला गया।
भारत ने भी अतीत में कर्ज लिया, लेकिन 1990 के दशक के बाद से भारत ने कर्ज पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम किया और उत्पादन, निर्यात और विदेशी निवेश के ज़रिए आर्थिक वृद्धि पर फोकस किया। इस बदलाव ने भारतीय रुपये को स्थिर बनाए रखने में मदद की, जबकि पाकिस्तानी रुपया लगातार गिरता रहा।
महंगाई और मुद्रा की गिरती ताकत
मुद्रास्फीति यानी समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी। अगर किसी देश में लगातार ज्यादा मुद्रास्फीति बनी रहती है, तो उसकी मुद्रा की खरीद क्षमता घट जाती है। पाकिस्तान में बीते कुछ दशकों में मूलभूत चीजों की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी हैं, जिससे वहां की मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय और घरेलू ताकत कमजोर हुई है। भारत में भी महंगाई रही है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसे काफी हद तक नियंत्रित रखा गया है। इस वजह से भारतीय रुपया उतनी तेजी से अपनी वैल्यू नहीं खोता, जितना पाकिस्तानी रुपया।






































