सरकार का डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन (शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह) वित्त वर्ष 2025-26 (FY2026) में 5.12 प्रतिशत बढ़कर 23.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया, लेकिन यह मार्च 2026 में समाप्त हुए वित्त वर्ष के लिए निर्धारित संशोधित बजटीय लक्ष्य से पीछे रह गया। पीटीआई की खबर के मुताबिक, वित्त वर्ष (2025-26) के संशोधित अनुमानों में, सरकार ने अपने प्रत्यक्ष कर संग्रह का अनुमान 24.21 लाख करोड़ रुपये लगाया था। इसमें 11.09 लाख करोड़ रुपये का कॉर्पोरेट टैक्स और 13.12 लाख करोड़ रुपये का व्यक्तिगत आयकर (STT सहित) शामिल था।
शुद्ध कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन
खबर के मुताबिक, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, शुद्ध कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन 10.99 लाख करोड़ रुपये रहा, और व्यक्तिगत आयकर (सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स सहित) लगभग 12.41 लाख करोड़ रुपये रहा। शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह (कॉर्पोरेट और गैर-कॉर्पोरेट कर सहित) वित्त वर्ष 26 में 23.40 लाख करोड़ रुपये रहा, जो वित्त वर्ष 25 में संग्रहित 22.26 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 5.12 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
रिफंड जारी करने की राशि में कमी
रिफंड जारी करने की राशि 2025-26 में साल-दर-साल आधार पर 1.09 प्रतिशत घटकर 4.71 लाख करोड़ रुपये रह गई। हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह लगभग 28.12 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024-25 के वित्त वर्ष की तुलना में 4.03 प्रतिशत अधिक है।
डायरेक्ट टैक्स क्या है?
डायरेक्ट टैक्स (प्रत्यक्ष कर) वह कर होता है, जो सीधे व्यक्तियों या संस्थाओं पर उनकी आय या संपत्ति के आधार पर लगाया जाता है। आयकर, कॉरपोरेशन टैक्स आदि इसी श्रेणी में आते हैं। इन करों का नियमन केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी द्वारा किया जाता है। डायरेक्ट टैक्स सीधे करदाता पर लगाया जाता है और इसे चुकाने की जिम्मेदारी भी उसी व्यक्ति या संस्था की होती है, जिस पर यह कर लगाया गया है। इसमें किसी मध्यस्थ की भूमिका नहीं होती।
डायरेक्ट टैक्स की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह प्रोग्रेसिव प्रणाली पर आधारित होता है। इसका मतलब है कि जिस व्यक्ति की आय अधिक होती है, उसे अधिक टैक्स देना पड़ता है, जबकि कम आय वाले व्यक्ति पर कम कर लगता है। उदाहरण के लिए, ज्यादा आय वाले व्यक्ति को कम आय वाले व्यक्ति की तुलना में अधिक आयकर देना होता है। यदि कोई व्यक्ति समय पर कर का भुगतान नहीं करता है, तो उसे ब्याज और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई और कारावास (जेल) की सजा भी हो सकती है।







































