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आशा-लता से कहा जाता- शमशाद जैसे गाओ:पिता की शर्त पर ताउम्र बुर्खा पहनकर गाया, फोटो खिंचवाने की मनाही थी, किशोर कुमार उठाते थे इनकी कुर्सी

by Dainik Mirror
April 13, 2026
in Entertainment
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आशा-लता से कहा जाता- शमशाद जैसे गाओ:पिता की शर्त पर ताउम्र बुर्खा पहनकर गाया, फोटो खिंचवाने की मनाही थी, किशोर कुमार उठाते थे इनकी कुर्सी
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1931 की बात थी भारत-पाकिस्तान उन दिनों एक था और कोई सीमाएं-सरहद नहीं थी। लाहौर-बॉम्बे और कोलकाता में फिल्में बनना शुरू हो चुकी थीं, रेडियो का दौर भी आ चुका था और कुछ म्यूजिक कंपनियां गाने रिकॉर्ड कर बेचा करती थीं। लाहौर की जेनोफोन म्यूजिक कंपनी उन दिनों काफी मशहूर हुआ करती थी। एक दोपहर एक नौजवान शख्स 12 साल की बच्ची का हाथ थामे स्टूडियो में पहुंचा। बच्ची का पहनावा एक दम आम था, जैसे किसी गरीब परिवार से हो। देखकर मालूम पड़ता था कि उसे अचानक ही वहां ऑडिशन में लाया गया हो। साथ पहुंचे शख्स ने साफ किया कि वो बच्ची को उसके परिवार से छिपाकर यहां लाया था। लीजेंड्री म्यूजिक कंपोजर गुलाम हैदर सामने बैठे थे। वही गुलाम हैदर, जिन्होंन लता मंगेशकर को ब्रेक दिया था। अब गाने की बारी थी, बच्ची ने झिझकते हुए पॉजिशन ली, स्टूडियो में सन्नाटा पसरा और बच्ची ने बहादुर शाह जफर की गजल मेरा यार मुझे मिले अगर गाना शुरू किया। उस बच्ची ने दो लाइन गाई ही थीं कि गुलाम हैदर ने गाना रुकवा दिया। बच्ची डर गई। मन में बस यही ख्याल था कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई। गुलाम हैदर ने पास खड़े असिस्टेंट को देखा और कहा- बच्ची के साथ 12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट बनवा लो। साथ ही कहा गया कि बच्ची को हर वो लग्जरी सुविधा दो, जो टॉप सिंगर्स को दी जाती है। उस बच्ची ने हुनर और गूंजती आवाज से वो कमाल दिखाया कि भारत की पहली प्लेबैक सिंगर बनीं और ‘सैंया दिल में आना रे…’, ‘कजरा मोहब्बत वाला….’ और ‘मुगल-ए-आजम’ का मशहूर गाना ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमां कर हम भी देखेंगे…’, जैसे 6 हजार गाने गाए। करीब 100 साल बाद भी उनके गाने सुने और रीमिक्स किए जाते हैं। उस बच्ची का नाम था शमशाद बेगम, जिनकी लेजेंड्री सिंगर लता मंगेशकर भी फैन थीं। जब लता नई-नई गायिकी में आईं तो उन्हें शमशाद की तरह गाने की सलाह दी जाती थी। एक दौर वो भी आया जब किशोर कुमार जैसे लीजेंड्री सिंगर भी शमशाद की खिदमद में कुर्सी उठाए पीछे-पीछे चलते थे। जब सिंगर्स को एक गाने के लिए 100 रुपए फीस दी जाती थी, तब फिल्ममेकर्स शमशाद को 2000 रुपए फीस देने के लिए भी राजी हो जाया करते थे। पिता की शर्त में ताउम्र बुर्का पहनकर गाया। पाबंदी ऐसी कि जवानी के दिनों में कोई तस्वीर तक क्लिक नहीं करवाई। फिल्मों में हीरोइन बनने के बड़े मौके भी पिता के गुस्से के भेंट चढ़े। आज शमशाद बेगम की 107वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इस खास मौके पर जानिए, हिंदी सिनेमा के इतिहास में गायिकी की मिसाल शमशाद बेगम की समाजिक बेड़ियों से निकलकर इतिहास रचने की कहानी- बचपन में स्कूल और शादियों में गाने से हुनर को मिली पहचान जलियावाला हत्याकांड के ठीक एक दिन बाद 14 अप्रैल 1919 को शमशाद बेगम का जन्म ब्रिटिश इंडिया के लाहौर में हुआ। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि शमशाद का जन्म लाहौर नहीं बल्कि अमृतसर में हुआ। उनके पिता मियां हुसैन बख्श के मिस्त्री थे। उन्होंने तंगहाली में 8 बच्चों की परवरिश की। शमशाद महज 10 साल की थीं, जब उन्होंने शादियों में गाना शुरू कर दिया। नन्ही सी बच्ची की आवाज इतनी बुलंद थी कि हर बार उन्हें ही गाने के लिए बुलाया जाने लगा। कुछ रिश्तेदार खुद होकर एक आना दे दिया करते थे। एक दिन शमशाद ने स्कूल के प्रोग्राम में कोरस में गाना गाया। प्रिंसिपल आवाज सुनकर दंग रह गईं। उन्होंने पास बुलाकर कहा- देखना, एक दिन तुम परिवार का नाम रौशन करोगी। इसके बाद उन्हें स्कूल प्रेयर की हेड सिंगर बना दिया गया। 12 की उम्र में 2 लाइनें सुनकर बडे़ म्यूजिक डायरेक्टर ने दिए 12 गाने शमशाद की आवाज आस-पड़ोस में पहचान बना रही थी, लेकिन पिता मियां हुसैन इससे काफी चिढ़ते। उन्हें बेटी का गाना पसंद न था। रूढ़िवादी परिवार में गाना सुनना भी हराम था। घर में रेडियो तक नहीं था। लेकिन 1931 में उनके चाचा आमिर गजल, कव्वाली के बड़े फैन थे। एक रोज उन्होंने शमशाद को गाते सुना और उन्हें हुनर परखने में देर न लगी। जैसे ही उन्हें पता चला कि लाहौर में जेनोफोन म्यूजिक कंपनी के ऑडिशन हो रहे हैं, वो परिवार से छिपकर शमशाद को अपने साथ ले गए। ऑडिशन में मशहूर सिगंर गुलाम हैदर, जो कंपनी के म्यूजिक डायरेक्टर थे ने 12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट दिया। तय हुआ कि हर गाने के 12 रुपए मिलेंगे। घर लौटकर जब चाचा ने ये खबर पिता को दी, तो वो खूब नाराज हुए। नाराजगी चरम पर थी। लंबी बहस के बाद चाचा ने भाई मियां हुसैन को समझाया कि ये हुनर हर किसी में नहीं होता, अगर पूरी दुनिया गाना गा रही है तो तुम्हें क्यों ऐतराज है। आखिरकार वो मान गए, लेकिन शर्तों पर। शर्त कि शमशाद का चेहरा कोई न देखे, उन्हें हमेशा बुर्का पहनकर गाना होगा। वो कभी तस्वीर क्लिक न करवाएं और न ही उनकी पहचान दुनिया के सामने आए। गायिकी के लिए उतावलीं शमशाद बेगम ने हर एक शर्त मानी और जेनोफोन म्यूजिक कंपनी केे साथ जुड़ गईं। शमशाद बेगम के शुरुआती कुछ गाने बिना उनके नाम के रिलीज किए गए। आरती गाने पर उनकी जगह सिंगर का नाम उमा देवी लिखा जाता और पंजाबी गानों में सुरंदिर कौर। उस समय रिकॉर्डिंग कंपनियों का मानना था कि लोग अपने धर्म के लोगों के ही गाने सुनना पसंद करते थे। जेनोफोन का कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद उन्हें कंपनी की तरफ से 5000 रुपए दिए गए थे। जेनोफोन म्यूजिक कंपनी से कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के बाद उन्हें पेशावर रेडियो और फिर दिल्ली के एयर इंडिया रेडियो में काम मिल गया। उनके गाने और प्रोग्राम काफी हिट हुआ करते थे। परिवार के खिलाफ जाकर की हिंदू लड़के से शादी साल 1932, शमशाद 13 साल की थीं, जब उनकी मुलाकात पड़ोस में रहने वाले वकालत के स्टूडेंट गणपत लाल बट्टो से हुई। दोनों की उम्र में बड़ा फासला था, लेकिन विचार जल्द ही एक होने लगे। शमशाद अक्सर चोरी-छिपे उनसे मिला करती थीं। ये वो दौर था, जब कम उम्र में ही शादी करवाने की कवायद थी, ऊपर से शमशाद का रूढ़िवादी परिवार। 13 की उम्र में ही उनके लिए लड़के देखे जाने लगे। एक रोज घरवालों तक शमशाद और गणपत लाल के रिश्ते की भनक लग गई। घर में हंगामा हुआ और लड़के देखने की गति बढ़ा दी गई। पिता की हर छोटी-बड़ी बात और शर्त मान लेने वालीं शमशाद इस बार अड़ गईं। उन्होंने कह दिया कि वो गणपत से ही शादी करेंगी। घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ रहे, लेकिन इसके बावजूद शमशाद ने महज 15 साल की उम्र में गणपत लाल बट्टो से 1935 में शादी कर ली। हीरोइन बनने का मिला ऑफर, पिता की सख्ती के चलते ठुकराया साल 1937 में शमशाद बेगम के गानों की बदौलत उन्हें लाहौर के ऑल इंडिया रेडियो में काम मिला। उनके हर गाने और हर प्रोग्राम जबरदस्त हिट रहे। ये वो दौर था, जब फिल्में बनना शुरू हो चुकी थीं, लेकिन रिकॉर्डिंग और एडिटिंग की तकनीकें नहीं आई थीं। उस समय हीरो-हीरोइन अपने गाने खुद गाया करते थे। जब दलसुख पंचोली ने एक रोज रेडियो में शमशाद की आवाज सुनी तो उन्होंने तय कर लिया कि वो उन्हें अपनी फिल्म की हीरोइन बनाएंगे और उनकी आवाज में गाने भी डालेंगे। जबकि उन्होंने कभी शमशाद को असल में देखा तक नहीं था। उन्होंने ये ऑफर दिया, तो शमशाद ने भी हामी भर दी। शमशाद ने एक स्क्रीन टेस्ट भी दिया, जो सफल रहा। लेकिन जैसे ही ये बात उनके पिता तक पहुंची, उनका गुस्सा फट पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि अगर उन्होंने ऐसी कोई ख्वाहिश पाली तो उनका गाना भी बंद करवा दिया जाएगा। उस दिन शमशाद ने गायिकी को चुना और पिता से कहा कि वो वादा करती हैं कि कभी कैमरे के सामने नहीं आएंगी। वादे के मुताबिक, शमशाद हमेशा बुर्के में ही प्रोग्राम करती थीं। कुछ साथ काम करने वालों ने उन्हें देखा था, लेकिन उन्होंने कभी तस्वीर क्लिक नहीं करवाई। महबूब खान ने मुंबई आने के लिए दिया बंगले, गाड़ी, नौकर का ऑफर साल 1941 में रेडियो में शमशाद की आवाज सुनकर डायरेक्टर महबूब खान इतने इंप्रेस हुए कि उन्होंने शमशाद को बॉम्बे लाने का फैसला कर लिया। वो सीधे उनके लाहौर स्थित घर पहुंचे। पति के सामने बात रखी, तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया। इस पर महबूब खान ने कहा कि अगर शमशाद उनके साथ बॉम्बे आएंगी, तो बदले में वो उन्हें बंगला, गाड़ी और हर सामान के साथ नौकर भी देंगे। अगर शमशाद चाहें तो अपने साथ 3-4 लोग भी ला सकती हैं। पति राजी हो गए, लेकिन पिता फिर अड़ गए। इस पर महबूब खान ने उनसे कहा- ‘आखिर कब तक बेटी को कुएं का मेंढ़क बनाए रखेंगे? इसे समुद्र में छोड़िए।’ जब शमशाद ने खुद भी जाने का फैसला कर लिया, तो पिता को भी मानना ही पड़ा। भले ही शमशाद को महबूब खान बॉम्बे लाए, लेकिन उन्हें पहली बार फिल्मों में गाने का मौका गुलाम हैदर ने फिल्म खजानची (1941) दिया। इस फिल्म के लिए शमशाद को हर एक गाने के लिए 200 रुपए फीस दी जाने वाली थी, लेकिन वो इससे नाखुश थीं। एक दिन उन्होंने फीस बढ़ाने की बात कही। प्रोड्यूसर ने पूछा वो क्या उम्मीद करती हैं। जवाब मिला- ‘हर गाने के लिए 700 रुपए।’ प्रोड्यूसर ने हामी भरते हुए हंसकर कहा- ‘अगर आप हर गाने के 2 हजार भी मांगतीं तो हम वो भी देते।’ फीस बढ़ने पर जहां एक तरफ खुशी थी, दूसरी तरफ नाराजगी थी कि उन्होंने ज्यादा क्यों नहीं मांगे, लेकिन समय के साथ आगे खानदान (1942), तकदीर (1943), पूंजी, जमींदार जैसी फिल्में करते हुए उनकी फीस लगातार बढ़ती चली गई। उस दौर में जब हीरोइन खुद अपने गाने गाती थीं, तब शमशाद बेगम ने दूसरी एक्ट्रेसेस के लिए गाने रिकॉर्ड किए और इस तरह वो भारत की पहली प्लेबैक सिंगर बनीं। लोगों की डिमांड में शमशाद की कॉपी करती थीं लता मंगेशकर शमशाद बेगम के बाद और भी कई सिंगर्स हिंदी सिनेमा से जुड़ने लगीं। 40 के दशक में सुरैया, मुबारक बेगम पहचान बना चुकी थीं और आशा भोसले, लता मंगेशकर नई-नई आई थीं। लता मंगेशकर, शमशाद के कई गानों में कोरस सिंगर रही थीं। लता मंगेशकर पतली और सुरीली आवाज में गाती थीं, जबकि शमशाद की आवाज में खनक थी और भारीपन। तब लता से अक्सर कहा जाता था कि शमशाद की ही तरह गाओ। जब लता मंगेशकर को 1949 की फिल्म महल का गाना आएगा, आएगा, आनेवाला…, मिला तो उन्होंने इसे शमशाद की कॉपी करते हुए ही गाया था। इसी तरह आशा भोसले ने भी 1948 की फिल्म मुकद्दर का गाना आती है याद हमको भी.., शमशाद की स्टाइल में गाया। पीछे-पीछे कुर्सी उठाए चलते थे किशोर कुमार, भविष्यवाणी हुई थी सच स्क्रीन मैगजीन को दिए एक पुराने इंटरव्यू में शमशआद बेगम ने गायिकी के दिनों को याद कर कहा था, मैं कभी फिल्मी पार्टियों में नहीं जाती थी, लेकिन स्टूडियो में मेरी कई यादें हैं। फिल्मिस्तान स्टू़डियो में रिकॉर्डिंग करती थी, तो दो युवा लड़के कोरस में काम करते थे। दोनों रिकॉर्डिंग के समय मेरी कुर्सी उठाए पीछे-पीछे चलते थे। एक लड़का सलीके वाला था और दूसरा अजीब सा दिखता, मजाक करता और खुद को नाकाम कहता था। बात करने पर खुद का मजाक उड़ाकर कहता था कि मेरे बड़े भाई बड़े अभिनेता हैं। लेकिन आवाज ऐसी थी कि कोरस में भी अलग सुनाई देती थी। मैं हमेशा उससे कहती थी कि देखना एक दिन तुम अपने भाइयों से भी बहुत आगे जाओगे। आगे वो अजीब सा लड़का संगीत जगत के सबसे महान सिंगर्स में शआमिल हुआ, बताइए क्या कोई किशोर कुमार के बिना भारतीय संगीत की कल्पना कर सकता है। समय के साथ किशोर कुमार इतने हिट हुए कि उन्हें शमशाद बेगम के साथ फिल्म अंगारे के गाने गोरी के नैनों में नींद भरी और नया अंदाज का गाना मेरी नींदों में तुम गाने का मौका मिला। कभी नौशाद भी थे ऑफिस बॉय, कई न्यूकमर्स के लिए गाए गाने जिस समय शमशाद बेगम ऑल इंडिया रेडियो में गाती थीं, तब उनके ऑफिस बॉय नौशाद हुआ करते थे। उन्हें शमशाद की देखरेख और खिदमद का काम दिया गया था। जब नौशान ने कंपोजिशन शुरू किया और उन्हें पहली फिल्म मंगू मिली, तो वो इसके लिए सीधे शमशाद के पास ही गए। नौशाद नए थे, लेकिन शमशाद मान गईं और उनके लिए ‘मोहब्बत दिल के बस इतने से अफसाने’ और ‘जरा प्यार कर ले बाबू’ को आवाज दी। 1941 में एसडी बर्मन भी जब सिनेमा से जुड़े तो उन्होंने पहली बड़ी फिल्म बहार (1941) मिलने पर शमशाद से ही मदद मांगी। शमशाद ने फिल्म के लिए ‘सैंया दिल में आना रे’ गाना गाया, जो आज भी सुना जाता है। जब राज कपूर ने कहा- मैं इतनी फीस नहीं दे सकता साल 1948 में आई फिल्म आग में राज कपूर, शमशाद की आवाज चाहते थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनकी फीस दूसरे सिंगर्स से 10 गुना ज्यादा है तो वो कतराने लगे। एक दिन हिम्मत कर राज कपूर, शमशाद के पास पहुंच गए। उन्होंने कहा- मैं चाहता हूं कि आप मेरी फिल्म आग में गाना गाएं, लेकिन मैं आपको इतनी फीस नहीं दे सकता। ये बेबाकी और जुनून शमशाद को भा गया। एक समय में वो राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर की फैन भी हुआ करती थीं। उन्होंने राज कपूर से कहा कि वो कम फीस में ही उनके लिए गाएंगी। पति की मौत से ऐसी बिखरीं कि लगा दिया सिंगिंग पर विराम साल 1955 में शमशाद बेगम के पित गणपत लाल बट्टो का एक रोड एक्सीडेंट में निधन हो गया। पति की मौत के बाद शमशाद ने गायिकी से दूरी बना ली। कई प्रोड्यूसर्स, कंपोजर ने शमशाद ने विनती की, लेकिन वो नहीं मानीं। शमशाद की गैरमौजूदगी में ही लता मंगेशकर को लगातार मौके मिलने लगे और स्टारडम मिला। साल 1957 में जब महबूब खान ने मदर इंडिया बनाना शुरू की, तो नरगिस की आवाज बनने के लिए शमशाद के अलावा किसी दूसरे सिंगर के बारे में न सोचा। शमशाद गायिकी छोड़ चुकी थीं, लेकिन महबूब खान भी उनसे गंवाने की जिद पर अड़े रहे। डेढ़ साल की मशक्कत के बाद आखिरकार शमशाद राजी हो ही गईं। 1957 में वो सफेद साड़ी पहनकर रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचीं। पहला गाना गाया, पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली। गाना सुनते ही स्टूडियो में मौजूद हर कोई रो पड़ा। गाना खत्म करते करते, उन्होंने गायिकी छोड़ने की जिद भी खत्म कर दी। और कहा- रोने के लिए सारा दिन, सारी रात है, मैं एक आर्टिस्ट हूं। फिल्म मदर इंडिया का गाना ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया’, ‘होली आई रे’, ‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली’ हिट रहे। आगे उन्होंने हावड़ा ब्रिज, जाली नोट, लव इन शिमला, और मुगल-ए-आजम जैसी सुपरहिट फिल्मों को आवाज दी। फिल्म मुगल-ए-आजम का गाना तेरी महफिल में किस्मत आजमां कर हम भी देखेंगे…, शमशाद बेगम ने लता मंगेशकर के साथ गाया था। शमशाद ने निगार सुल्ताना को आवाज दी, जबकि लता मंगेशकर मधुबाला की आवाज बनीं। 1965 में शमशाद ने हमेशा के लिए फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। हालांकि कुछ कंपोजर्स की जिद पर उन्होंने चंद फिल्मों में आवाज दी। रिटायरमेंट के बाद 1968 की फिल्म किस्मत का गाना कजरा मोहब्बत वाला जबरदस्त हिट रहा था। बेटी को नहीं दी गायिकी की इजाजत गायिकी छोड़ने के बाद शमशाद बेटी ऊषा और दामाद लेफ्टिनेंट कर्नल योगेश रत्र के साथ मुंबई में रहने लगीं। शमशाद बेगम की इकलौती बेटी ऊषा भी सिंगर बनना चाहती थीं, लेकिन शमशाद ताउम्र इसके खिलाफ रहीं। उनका मानना था कि फिल्म इंडस्ट्री में बहुत राजनीति बढ़ चुकी है। 6 सालों तक शमशाद को मृत समझते रहे लोग 1998 में खबर आई कि सिंगर शमशाद बेगम गुजर गईं। फिर 2004 में खबर आई कि जिसे 1998 में लोगों ने मरा हुआ मान लिया था, वो शमशाद अभी जिंदा है। पहले जिस शमशाद बेगम का इंतकाल हुआ था, वो सायरा बानो की दादी थीं। आखिरकार 23 अप्रैल 2012 में लेजेंड्री सिंगर शमशाद बेगम का 94 साल की उम्र में निधन हो गया। उनकी मौत की खबर कम लोगों को ही दी गई। वैसे तो शमशाद बेगम मुस्लिम थीं, लेकिन उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों से किया जाए।
(नोट- ये कहानी शमशाद बेगम के राइटर गजेंद्र खन्ना को दिए गए इंटरव्यू, स्क्रीन को दिए गए इंटरव्यू और रिसर्च के आधार पर लिखी गई है।)

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